आज निहारो तुम विगत को
क्या खोया क्या पाया है
घूम रहा समय का पहिया
गणतंत्र दिवस फिर आया है..... गणतंत्र दिवस फिर आया है .
अट्टालिका की ऊंची छत से
क्या पीछे तृण कुटीर दिखता है
विद्युत से
चुंधियाये नयनों से
टिम-टिम करता दीप दिखता है
चौडी -चौड़ी सड़कों से पीछे
संकरा पतला रास्ता दिखता है
दमघुट शहरी हवा से पहले
क्या मदमस्त पवन बहता है ……क्या मदमस्त पवन बहता है
आज निहारो तुम विगत को …… गणतंत्र दिवस फिर आया है.
तुम्हारे पूर्वज हथोड़ा चलाते
सूखे खेतों में हल चलाते
काँटों भरे वन में विचर कर
पशु पालते, बकरी चराते
पर तुमने सौभाग्य पाया है
निष्कंटक निर्भय पथ पाया है
बीत गयी अंधियारी रैना
सुनैहरा सवेरा आया है ........ सुनैहरा सवेरा आया है
आज निहारो तुम विगत को …… गणतंत्र दिवस फिर आया है.
प्रगति - रथ अब रुकने न पाए
कोई कंटक तुम्हारी राह न आये
आगे बढ़ते पग न डगमगायें
भ्रम कोई तुम्हे डिगा न पाए
प्रेम का झोंका तुम्हें भिगो कर
संकल्प शक्ति मन में जगाए
नि:सृत हो दया भाव मन से, पर
शत्रु का कलेजा दहल जाए....शत्रु का कलेजा दहल जाए
नि:सृत हो दया भाव मन से, पर
शत्रु का कलेजा दहल जाए....शत्रु का कलेजा दहल जाए
आज निहारो तुम विगत को …… गणतंत्र दिवस फिर आया है
आज निहारो तुम विगत को
क्या खोया क्या पाया है
घूम रहा समय का पहिया
गणतंत्र दिवस फिर आया है..... गणतंत्र दिवस फिर आया है
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रचना
: प्रकाश गौतम
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