Saturday, 7 March 2015

निर्णय- Nirnaya

अकसर बहुराहे  पर खड़ा हो जाता हूँ मैं,
हो कर परेशान, भटका हुआ, दिशा हीन.  
नहीं सूझता किस तरफ जाऊँ मैं,
असमंजस मंडराने लगता है मेरे आगे.
उहापोह उधेड़बुन दौड़ने लगती है मन में ,
इधर जाऊं या उधर, पीछे हटूं या जाऊँ आगे.
तब एक रास्ता चुनना हो जाता है कठिन,
तन में दौड़ जाती है सिहरन सोच कर कि  
एक गलत कदम भटका देगा मंजिल से.  
तब बेलने पड़ेंगे कितने पापड़,
वापिस सीधी  राह पर वापस आने को
संभव  है, कभी वापिस न आ सकूँ
या खो जाऊँ भटकीली अंधी गलियों में
जो बिलकुल भी नहीं है सही.
इसलिए कोई  निर्णय तो लेना ही पड़ेगा,
नहीं रह सकता खड़ा एक ही जगह
पत्थर की तरह किंकर्तव्य विमूढ़,.
सोचता हूँ कभी अगर फँस जाऊँ, 
अकेला सागर की लहरों में ,
तब भी क्या , हो कर किंकर्तव्य विमूढ़
सोचता रह जाऊंगा, स्थिर एक ही जगह?
अगर नहीं लूँगा कोई निर्णय तो,
डूब जाऊँ गहरे सागर की गहराइयों में,
या कोई बड़ी मछली निगल जाएगी मुझे
पर इतना तो जानता हूँ मैं कि
व्यर्थ के छटपटाने से थक जाऊँगा में.
और, थकान से पक्का  डूब जाऊँगा मैं
तब मेरे लिए क्या होगा सबसे उचित
यह सोचने के लिए भी कितना सोचता हूँ.
पर कोई निर्णय तो  लेना पड़ेगा मुझे.
अगर कभी फंस जाऊँ बर्फीले तूफान में
किसी कभी पर्वत की ऊंची घाटी में,
जहाँ चल रही हो तेज बर्फीली आंधियां
तब भी तो लेना ही पड़ेगा मुझे कोई निर्णय,
नहीं तो दफ़न हो जाऊँगा मै हिमनद में,
या बर्फीली हवा उडा ले जाएगी मुझे.
इस लिए मैंने कर लिया है निश्चय,
अगर हो जाऊँ दो चार ऐसी स्थितियों से
तो मै ले लूँगा सबसे बढ़िया निर्णय
जो उतरेगा खरा मेरे विवेक की कसौटी पर.
कर लिया है अब मैंने पक्का प्रण,
ले लूँगा जो भी होगा सबसे अच्छा निर्णय
फँस जाऊँ अगर मैं दुविधा मैं कभी
जीवन के दोराहे, चौराहे या बहुराहे पर 
                  

                                  रचना: गौतम प्रकाश 

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