युद्ध और शांति
शांति
के लिए तो बस एकमात्र सुगम रास्ता है वह है आपसी संवाद
निरीह लोगों का रक्त बहा कर जो जीत पर खुशी के गीत गाता है
नहीं
मिलता सम्मान उसको वह औरों की नजरों में गिर जाता है
चाहे मृत शरीर पड़े हो धरा पर परंतु विरोध के भ्रमर उड़ते है
बुझ
जाए प्रतिशोध की आग चाहे दबे
अंगारे अक्सर भड़कते हैं
आज तक किस राजा महाराजा का राज स्थाई रह पाया है
चले है क्रांति-परिवर्तन के अंधड़
जब, तब कोई नहीं बच पाया है
उजड़ी मांगो -उजड़ी कोखों के श्रापों से कौन रह पाया है आबाद
मासूमों
की आहें एटम बम से
भी भयानक है जो कर देती है बर्बाद
खिलते थे रंगीन फूल जहां और फैली होती थी भीनी भीनी सी सुगंध
टूटे
फूटे खंडहर बिखरे हैं यहाँ वहाँ और फैली है लाशों की
दुर्गंध
यद्ध की आग में जलते हुए खेतों
में अब सुंदर पुष्प नहीं
खिलेंगे
घुल
गया जहर सब बीजों में- हर डाली में अब सिर्फ कांटे ही मिलेंगे
युद्ध
की आग भड़काते हुए तुमने क्या दृष्टी को विगत में
दौड़ाया है
हो
जाएगा अमर कोई ऐसा विचार भी तुम्हारे मन में कैसे आया है
अशोक, चंद्रगुप्त, सिकंदर, सीजर, ज़ार भी काल से नहीं
बच पाए है
फिर
रक्तपातित क्रान्ति करने के कुत्सित विचार मन में कैसे
आए है
सोचो तुम्हारी भी तो निरीह प्रजा
है, क्या शत्रु नहीं लेंगे प्रतिकार
स्वीकारो
सत्य को त्याग दो वृथा अहंकार करो शांति को स्वीकार
नहीं
रहती वह वरतु स्थाई, जो मिलती है रक्तपातित
क्रान्ति से
होता
असीम सुख उसी में जो मिलता है आपसी संवाद और शांती से
इसलिए
दूसरों को जीतने के उपक्रम से पहले करो अहंकार का नाश
जब तुम
स्वयम होगे प्रकाशित तभी तो फैला पाओगे चतुर्दिक प्रकाश
युद्ध
सब को देता है पीड़ा युद्ध
से सब कुछ हो जाता है बर्बाद
शांति
के लिए तो बस एकमात्र सुगम रास्ता है वह है आपसी संवाद
रचना : प्रकाश गौतम
1 comment:
उत्तम
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