Sunday, 23 August 2015

Social Dogmas and Superstitions: प्रचलित सामाजिक मान्यताएँ व अन्धविश्वास

                          
दुनियाँ का कोई देश, कोई कोना ऐसा नहीँ है जहाँ अंध विश्वास व्याप्त नहीँ है. सामान्यत: अंध विश्वासोँ का कोई वैज्ञानिक आधार नहीँ होता है परंतु कुछ प्रचलित रुढियाँ व अंध विश्वास वास्तव मेँ वैज्ञानिक तथ्यो पर आधारित है. भारत मेँ ग़्रामीण क्षेत्रोँ मेँ लोग जूते घर के बाहर खोल देते हैँ. घर के अंदर जूते पहन कर नहीँ जाते. शहर मेँ इस बात को हंसी कि नजर से देखा जाता है. शहर मेँ लोग जूते पहन कर ही घर के अंदर बेड रूम, ड्राइंग रूम, यहाँ तक कि रसोईघर तक चले जाते हैँ. अधिकतर लोग शहरोँ मेँ टेबल कुर्सी पर बैठ कर व जूते पहन कर ही खाना भी खाते हैँ. गावोँ व धार्मिक स्थलोँ मेँ जूते घर के बाहर खोलने का आधार यह है कि जूतोँ मेँ गंदगी, धूल मिट्टी लगी होती है. घर के अंदर जूते ले जाने से किटाणु, धूल  मिट्टी व गंदगी घर के अंदर चली जाती है. इससे किटाणु हवा व खाने के साथ शरीर के अंदर जा कर बिमारियाँ उत्पन्न करते हैँ.

यह मान्यता भी है कि सूरज् ढल जाने के बाद सूई धागे का प्रयोग, कपडोँ की सिलाई का काम नहीं करना चाहिए. इस का आधार यह है कि रात के समय पर्याप्त प्रकाश नहीं होता है. इससे सिलाई वगैरह करते समय आंखोँ पर जोर पड़ता  है व आंखेँ खराब होने का डर रह्ता है. इसी प्रकार रात के समय हज़ामत करने, नाखून काटने व धारदार औजारोँ का प्रयोग करने का रिवाज़ नहीँ है क्योँकि कम प्रकाश होने कि वजह से घायल होने का भय रह्ता है.

पुराने समय मेँ लोग रसोईघर मेँ चौका लगा कर भोजन बनाते थे. चौके को गोबर से लीपा जाता था. गाय का गौंच और गोबर किटाणु नाशक का काम करता है. इससे खाने की शुद्ध्ता बरकरार रह्ती है. रात्रि के समय जोहड ओर् बावडियोँ से पानी नहीँ भरा जाता था. इस के पीछे असली कारण यह था कि रात के समय जंगली जानवर ओर् अन्य जहरीले जंतु जल स्रोतोँ के पास जल पीने व शिकार करने के लिये एकत्र होते हैँ जो नुकसान पहुंचा सकते हैँ.

यह मान्यता भी है कि सोते समय जल से भरा पात्र सिरहाने के पास रखना चाहिये. इस के दो फायदे हैँ. पहला यह कि रात को यदि प्यास लग जाये तो सुगमता से पीने के लिये पानी उपलब्ध हो जाता है. दूसरा फायदा यह है कि शयन कक्ष मेँ नि:श्वसन क्रिया से कार्बन डाईऑक्साईड उत्पन्न हो जाती है जिससे शरीर मेँ औक्सीजन की मात्रा कम हो जाने से दिमाग को कम औक्सीजन मिल पाती है. जिससे भ्रम कि स्थिति बन जाती है. औक्सीजन के अभाव मेँ दिमाग डरावने सपने देखने लगता है. शुद्ध हवा मेँ सोने से सपने तो दिखाई देते हैँ पर भयानक नहीँ. सिरहाने के पास पानी रखने से कार्बन डाईऑक्साईड सिरहाने रखे पात्र मेँ रखे पानी मेँ घुल जाती है. बची हुई हवा शुद्ध हो जाती है. हिमालय के अत्यंत ऊंचाई वाले इलाकोँ जैसे कि किन्नौर, लाहौल स्पिती मेँ तो यह विधि बहुत ही कारगर है.

मंदिर व घरो मेँ पूजा करते समय धूप जलाने से वातावरण शुद्ध हो जाता है. धूप व ज्योति जलाने के दो फायदे हैँ. पहला यह कि हवा मेँ जो भी किटाणु होते हैँ वे ज्योतिपुंज की  लौ के सम्पर्क मेँ आने से नष्ट हो जाते हैँ. दूसरा फायदा यह है कि तेल या घी का कुछ भाग वाष्पिक़ृत  हो कर वातावरण मेँ मिल जाता है जिससे शुष्कि मिट जाती है. वातावरण मेँ मिल कर वसा की छोटी छोटी बूंदेँ जल कणोँ को संघनित करने लिये प्लेटफोर्म का काम करती है.

मंदिर की घंटियोँ कि ध्वनि से जो कम्पन उत्पन्न होती है, उससे वातावरण मे उपस्थित किटाणुओँ का नाश हो जाता है. साथ ही घंटियोँ व घडियालोँ की ध्वनि तरंगेँ स्नायु तंत्र को झनझनाती है जिस से सनायविक तनाव शिथिल होता है व तनाव से राहत मिलती है.

यह मान्यता है कि रात के समय पीपल व बरगद  के पेड के पास नहीँ जाना चाहिये. वास्तव मेँ पीपल के पेड के पास रात के समय कार्बन डाइऑकसाईड भारी मात्रा मेँ एकत्रित होती है क्योंकि पीपल के पेड का फोटो सिंथेसिस  रेट बहुत अधिक होता है. रात के समय यह पेड भारी परिमाण मेँ  कार्बन डाईऑक्साईड सोखता व छोडता रहता है. इससे यदि इस पेड के नीचे अगर कोई सो जाए तो बेहोश हो सक्ता है. इस से यह गलत भ्रांतियाँ फैल गई है कि पीपल के पेड पर भूत रह्ते हैँ. इसी प्रकार बरगद आदि बडे आकार के वृक्षोँ के उपर चमगादड् ओर अन्य खतरनाक जीव जंतु रह्ते हैँ. रात के समय उनके नीचे जाना वास्तव मेँ ही खतरनाक होता है.

जब भी सूर्य या चन्द्रग्रहण होता है तो उसे देखना अच्छा नहीँ माना जाता है. यह मान्यताएँ पुरातन समय से ही प्रचलित है. आज वैज्ञानिक प्रयोगोँ से सिद्ध हो चुका है कि ग्रहण के समय विभिन्न प्रकार की तेज फ्रिक्वैंसी की खतरनाक कॉस्मिक किरणेँ धरती पर पड्ती है जो जीव-जंतुओँ कि आखोँ व चमड़ी को नुकसान पहुंचा सकती है.

तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा. यह प्रचलित कहावत है. इस का वैज्ञानिक आधार यह है कि अधिक व्यक्ति यदि अपनी राय देने लगते है तो एकमत नही हो पाते और इससे मामला खटाई मेँ पड़ सकता है.

कभी-कभार कुत्ते और सियार आदि रोने लगते है. आम तौर पर मान्यता है कि ऐसा किसी अशुभ घटना का परिचायक है. वास्तव मेँ ये प्राणी मनुष्योँ को सुनाई दे जाने वाली आवाजोँ की आवृति से कम व अधिक आवृति की ध्वनि तरंगेँ सुन लेते है तथा कम आवृति की कम्पन भी अनुभव कर लेते हैँ, रात को कम प्रकाश मेँ विभिन्न आकृतियाँ व छवियाँ देखने की क्षमता रखते हैँ एवँ प्रतिक्रिया मेँ सामूहिक रूप से रोने की आवाजेँ निकालने लगतेँ हैँ. ऐसा करना सामान्यत: अपने समुदाय को चौकस करना होता है.

उपरोक्त प्रकार की सैँकड़ोँ  मान्यताओँ का वैज्ञानिक आधार है. परंतु कुछ ऐसी घिसी-पिटी मान्यताएँ हैँ जिनका कोई सिर-पैर नहीँ है, जैसे बिल्ली का रास्ता काट जाना, छिपकली का उपर गिर जाना, कौए द्वारा किसी के उपर बीट कर देना, सुबह सुबह किसी का मुहँ देखना शुभ व किसी का अशुभ होना. किसी की नज़र बुरी होना. बुरी नज़र उतारने के लिए नीँबू मिर्ची दरवाजे पर लट्काना. बुरे सपनोँ से बचने के लिये सोते समय सिरहानेँ के नीचे चाकू, छूरी या तलवार रखना. गले-बाजू मेँ गंडे ताबीज़ बाँधना, भभूत पर्स मेँ रखना, बिल्ली की जेर और गीदड़ सिंगी रखना, कोई शुभ काम करते छींक आना आदि - सभी मान्यताएँ मानसिकता व व्यक्तिगत सामाजिक मनोविज्ञान पर आधारित है. अच्छे से अच्छे पढे-लिखे लोग व विज्ञान का अच्छा ज्ञान रखने वाले लोग भी इन मान्यताओँ से अछूते नहीँ है.
                                                         .........प्रकाश  गौतम्


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