Friday, 25 September 2015

हिमाचल मेँ श्राद्ध की रीत : SHRADDH IN HIMACHAL

हिमाचल प्रदेश हिमालय पर्वत का एक अत्यंत रमणीक क्षेत्र है. वेदोँ पुराणोँ और स्मृति ग्रंथोँ मेँ भी इस भू-भाग का व्यापक वर्णन आया है. इस प्रदेश की अधिकाँश जनसंख्या हिन्दू धर्म को मानने वाली है. जैसा कि भारत के अन्य भागोँ मेँ होता है, अन्य हिन्दू त्योहारोँ की तरह इस प्रदेश मेँ श्राद्ध श पर्व प्रति वर्ष मनाया जाता है. श्राद्ध का शाब्दिक अर्थ है श्रद्धा के साथ मनाया जाने वाला कृत्य. श्राद्ध के द्वारा पुर्वजोँ को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है.

यद्यपि आधुनिकता के युग मेँ शहरोँ मेँ अधिकाँश लोग भाग दौड के चलते श्राद्ध नहीँ मनाते परँतु हिमाचल प्रदेश के गावोँ मेँ श्राद्ध सँस्कृति का अभिन्न अँग है. श्राद्ध जहाँ एक ओर दिवंगत पितरोँ को श्रद्धांजली है वहीँ दूसरी ओर यह अपनी आत्मा और मन को पवित्र करने की अनौखी मनोवैज्ञानिक विधि है. जब तक हम जीवित रहते हैँ, अपने मृतक परिवार जनोँ को लगातार याद करते रह्ते हैँ, चाहे इसका प्रकटावा औरोँ के सामने करेँ या न करेँ. हमारे मन मेँ कहीँ न कहीँ उनकी यादेँ बसी रह्ती है.

यद्यपि वेदोँ मेँ श्राद्ध कर्म का कोई उल्लेख नहीँ है परंतु एक किँवदँती के अनुसार श्राद्ध कर्म का आरम्भ सप्त ऋषियोँ मेँ से एक अत्रि ऋषि द्वारा उस समय किया गया था जब ब्रह्मा जी के पुत्र ऋषि नेमि की अल्पायु मेँ मृत्यु हो गई थी. अत्री  ऋषि  ने ब्रह्मा जी के द्वारा मृत पुत्र हेतु श्राद्ध कर्म करवाया गया था. इससे ब्रह्मा जी का पुत्र के प्रति शोक कम हो गया था.

श्राद्ध पर्व प्रति वर्ष अश्विन मास की शुक्ल पुर्णीमा तिथी प्रारम्भ हो कर इसी माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्य तिथी तक मनाया जाता है. यह पर्व चान्द्र तिथियोँ के अनुसार मनाया जाता है अर्थात जिस तिथि मे जिस व्यक्ति कि मृत्यु हुई हो, उपरोक्त  तिथियोँ मेँ श्रद्धा पूर्वक ब्राह्म्ण को घर बुला कर जिमाया जाता है व ब्राह्म्ण को यथा सम्भव वही वस्तुएँ दान मेँ दी जाती है जो मृतक को पसन्द थी. मृतक को पितर माना जाता है. यदि पितर स्त्री थी तो किसी स्त्री ब्राह्म्ण को भोजन कराया जाता है. यदि पितर पुरुष था तो पुरुष ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है. केवल मात्र ब्राह्म्ण को ही भोजन नहीँ कराया जाता बल्कि यथा सम्भव अन्य लोगोँ को भी श्राद्ध का भोजन कराया जाता है. तत्पश्चात पूरे परिवार के लोग अपने पितरोँ को याद करते हुए बचा हुआ भोजन ग्रहण करते है. जब तक श्राद्ध पूरा नहीँ हो जाता, घर के सदस्य अन्न ग्रहण नहीँ करते. बिना द्क्षिणा श्राद्ध पूरा हुआ नहीँ माना जाता.

कुछ लोग मात्र चुनिन्दा तिथियोँ को ही श्राद्ध करते हैँ परंतु कोई-कोई लोग सम्पूर्ण पितृ पक्ष की प्रत्येक तिथी को श्राद्ध करते है. यह अपनी सामर्थ्य व समय की उपलब्धता पर निर्भर करता है. यह मान्यता है कि पितृपक्ष मेँ पितर अपने वंशजोँ की ओर इस आशा से ताकते हैँ कि कोई तो होगा जो उनके निमित्त श्राद्ध करेगा अथवा कम से कम तिलांजली देगा.

जिस दिन श्राद्ध प्रारम्भ होते हैँ, उस दिन पूरे घर की सफाई की जाती है. चूल्हा व चौका लीपा जाता है. मुख्य द्वार की दहलीज को पानी से साफ किया जाता है. एक लोटे मेँ जल भर कर उसमेँ कच्चा दूध, सफेद फूल व तिल मिला कर दहलीज का पूजन किया जाता है व बाहर से अन्दर की ओर जल गिराते हुए पित्रोँ का स्वागत  किया जाता है. इस जल मिश्रण को पात्री कहा जाता है. श्राद्ध करने वाला बुद्बुदाता रहता है कि पितरोँ आप भर कर आइये व खाली लौट कर जाइए. इसका तात्पर्य यह है कि पितर अपना आशिर्वाद देते हुए अन्न, धन् ओर स्म्रिद्धि ले कर आएँ. घर के एक अन्दर मुख्य दरवाजे से कुछ दूरी पर गोबर से फर्श लीपा जाता है जहाँ पर मकई वगैरह नई फसलोँ से प्राप्त अनाज के दाने फैला कर रखे जाते हैँ. इनके उपर विभिन्न प्रकार के पकवान पत्तलोँ अथवा थालियोँ मेँ सजा कर रखे जाते हैँ जिन्हे नेऊज कहा जाता है. इनके साथ कच्ची मकई, खीरे और अमरूद, सेब् आदि ऋतु फल भी रखे जाते हैँ. जो ब्राह्मण श्राद्ध खाता है, उसे जाते समय उपरोक्त सभी वस्तुएँ दान मेँ दे दी जाती है.

श्राद्ध के अंत मेँ कौए को एक ग्रास छत के उपर  ‘काक:’ बोल कर दिया जाता है. कौए को यमराज का प्रतीक माना जाता है. कौआ मरे हुए पशुओँ का माँस खा कर पर्यावरण शुद्ध करता है व खेतोँ से हानिकारक कीडोँ को खाता है. कौए की कायँ-कायँ सुन कर गिद्ध, सियर आदि अन्य जंतु मृत जीवोँ का भक्षण कर पर्यावर्ण शुद्ध करते हैँ. इन जीवोँ के प्रति भी श्राद्ध पर्व मेँ आभार प्रकट किया जाता है. इसी प्रकार गाय को ‘गौ-ग्रास’ दिया जाता है. गाय पितरोँ को वैतरणी नदी पार कराती है, ऐसी मान्यता है. वास्तव मेँ ये दोनो जीव समाज के लिये बहुत ही उपयोगी जीव है. गाय क दूध, गोबर, गौंच्, खाल, हड्डी तक सब उपयोगी है. तभी उसे ‘गौ माता’ का दर्जा दिया गया है. एक ग्रास कुत्ते को दिया जाता है. कुत्ता धर्म का प्रतीक है. उसकी स्वमीभक्ति जग प्रसिद्ध है. मरते दम तक वह अपने स्वमी के प्रति वफादार रह्ता है.

श्राद्ध के अंतिम दिन पात्री उल्टी डाली जाती है. श्राद्ध करने वाला व्यक्ति अन्दर से बाहर की ओर पात्री डालते हुए कहता चलता है कि अपना आशिर्वाद देते हुए खुशी खुशी चले जाओ और अगले वर्ष पितृपक्ष मेँ अपना आशिर्वाद ले कर फिर से आना. ऐसा करते हुए श्राद्ध करने वाला नेउज रखने वाले स्थान से बाहर दहलीज की ओर पात्री डालते हुए जाता है.

श्राद्ध का खाना व पिँड कभी भी हाथ मेँ रख कर नहीँ देना चाहिये अपितु धरती पर रख्न कर देना  चाहिये या जल मेँ प्रवाहित करना चाहिये. जल मेँ प्रवहित करने से जल मेँ रहने वाले असंख्य जीव अन्न कण ग्रह्ण करते हैँ. आखिर हमारा शरीर पंच महभूतोँ से बना है. प्रकृति भी पंच महभूतोँ से ही निर्मित है. महाभारत के शांतिपर्व मेँ श्राद्ध कर्म के बारे मेँ विस्तार के साथ विवेचन किया गया है. महाभारत का युद्ध समाप्त हो जाने के बाद् भीषम पितामह जब छ: माह तक शर शैया पर थे तब उन्होने युधिष्ठिर् को श्राद्ध कर्म के नियमोँ बारे विस्तार से बताया था.
पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्पितरं त्रायते सुत: ।
तस्मात्पुत्र इति प्रोक्त: स्वयमेव स्वयंभुवा 11

इसका तात्पर्य यह है कि पुत्र अथवा अन्य पात्र व्यक्ति द्वारा श्राद्ध करने से घोर नरक मेँ पडे हुए पितर भी कष्ट से मुक्त व सँतुष्ट हो जाते हैँ. इसी प्रकार शास्त्रोँ मेँ कहा गया है कि आयु वृद्धि, पुत्र प्राप्ती, यश, कीर्ति, पुष्टि, बल, जय, धन, धान्य, सुख प्राप्ती हेतु  पितरोँ की पूजा व श्राद्ध अवश्य ही करने चहिए.
 आयु: पुत्रान् यश: स्वर्गं कीर्ति पुष्टिं बलं श्रिय: 1
 पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात 11

शास्त्रोँ मेँ यह भी कहा गया है कि यदि किसी के पास समय की कमी हो, परिस्थितियाँ ऐसी हो कि वह पकवान इत्यादि बना कर श्राद्ध करने मेँ असमर्थ हो तब उसे एक पात्र मेँ तिल मिला कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरोँ का स्मरण कर तीन बार जल गिरा कर पितरोँ के प्रति तर्पण कर देना चाहिये. ऐसा करने से भी पितर प्रसन्न हो जाते हैँ. यदि कोई परिस्थितिवश पूरे पितृ पक्ष मेँ श्राद्ध न कर पाए तो अंतिम श्राद्ध के दिन अश्विन कृष्ण अमावस्य को एक साथ ही ज्ञात अथवा अज्ञात पितरोँ के निमित श्राद्ध अथवा तर्पण कर देना चाहिये. यदि तर्पण के लिये तिल अथवा कोई पात्र उपलब्ध न हो सके तो किसी जल स्रोत से तीन अंजली जल का तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके पितरोँ के निमित्त कर देना भी श्राद्ध के समान ही फल देता है. यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति सामर्थ्य व समय होते हुए भी श्राद्ध कर्म नहीँ करता तो वह घोर पाप का भागीदार होता है. किसी सक्षम बुजुर्ग पिता, दादा अथवा शास्त्रोँ मेँ उल्लिखित वयक्ति के रहते अन्य व्यक्ति जैसे बेटे, पोते इतयादि के द्वारा श्राद्ध करना नियम सम्मत नहीँ है. यद्यपि तीर्थ स्थानोँ मेँ किसी भी व्यक्ती द्वारा अपने कुल के पितरोँ के निमित्त तर्पण किया जा सक्ता है जो श्राद्ध से भी सौ गुणा अधिक फल प्रदान करता है. अपरिहार्य परिस्थिथियोँ मेँ एक पिता भी पुत्र का श्राद्ध कर सक्ता है.

 श्राद्ध पर्व को मनाने के तरीके मेँ यदि समय व परिस्थितियोँ के अनुसार बदलाव हो तो अति उत्तम होगा. श्राद्ध पर्व मेँ परँपरागत जल स्रोतोँ की सफाई की जा सकती है. फलदार, छायादार, पत्तीदार पौधे रोपे जा सकते हैँ. कूडा-कचरा साफ कर के पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त किया जा सकता है. गरीब बच्चोँ की फीस व वर्दियोँ का प्रबन्ध किया जा सक्ता है. साफ पीने के पानी, फिल्टर आदि की व्यवस्था करनी भी अति उत्तम होगी. ऐसे व्यक्ति को दान न दिया जाए जो जुआ, शराब व अन्य प्रकार के व्यसन व समाज विरोधी कार्य करे.

वास्तव मेँ हम लोग तभी इस संसार मेँ हैँ जब हमारे पूर्वज व पितर थे. उन्ही के कारण हर किसी को शरीर, धन, अन्न, ज़मीन, पैतृक सम्पती प्राप्त होती है. श्राद्ध पित्रोँ के प्रति धन्यवाद प्रकट करने का संस्कार हैँ. कई लोग श्राद्ध को ढकोसला मानते है परंतु श्राद्ध हमारी संस्कृति का अटूट अंग है. इस पर्व को मनाने से कोई नुक्सान नहीँ है. बस, मनाने का तरीका आडँबर रहित होना चाहिए. हिमाचल प्रदेश मेँ ग्रामीण अंचलोँ मेँ एक कहावत प्रसिद्ध है ‘जिऊँदेया खे तिल नी, मरेदेया खे तलूँएँ’. इस कहावत बारे भी मनन करने की आवश्यकता है.

                                                             ......प्रकाश गौतम

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