Friday, 23 October 2015

डाक यात्रा की कहानी: Story of Postal Travel

जब हम डाक विभाग की बात करते है, हमारे मन मेँ चिट्ठियाँ बांटते हुए पोस्टमैन, पत्रोँ, मनीऑर्डरोँ, लाल लैटर-बॉक्सोँ और डाकघर की तारीख-मोहर का विचार हमारे मन मेँ आता है। परंतु डाक विभाग का जो रूप आज हमारे सामने है, उसने विगत मेँ कई रूप रंग बदले है और आज भी दिन-प्रतिदिन इस मेँ नए-नए बदलाव आते जा रहे।

हमारे मन मेँ यह विचार आता है कि पहला सँदेशवाहक कौन था। इतिहास मेँ इस बारे मेँ कुछ भी लिखित मेँ नहीँ है। इस बारे हमेँ समृतियोँ और पुराणोँ के माध्यम से भूतकाल मेँ  झांकना होगा तब हमेँ पता चलेगा कि देवऋषि नारद जी पहले संदेशवाहक थे। वे देवताओँ, दानवोँ, शिवजी, ब्रह्मा जी, विष्णु जी के बीच संदेशोँ का आदान-प्रदान  करते थे। संदेशवाहक के लिये  पुराणोँ मेँ दूत शब्द का प्रयोग किया गया है। त्रैतायुग मेँ रामायण की रचना महऋषि बाल्मिकी के द्वारा की गई। इसमेँ उल्लेख आता है कि भगवान राम ने अंगद को रावण के पास दूत बना कर भेजा था। द्वापर युग मेँ पाँडवोँ की ओर से भगवान कृष्ण कौरवोँ के पास दूत बन कर गए  थे।  इतिहास मेँ वर्णित है कि विभिन्न सम्राट और राजा एक दूसरे के पास संदेश भेजने की लिये दूत का सहारा लेते थे। महाकवि कालिदास ने अपनी रचनाओँ जैसे अभिज्ञान शाकुंतलम, कुमारसँम्भव, मेघदूतम मेँ संदेशवाहक पात्रोँ का उल्लेख किया है। कौटिल्य ने अपनी रचना अर्थशास्त्र मेँ संदेशवाहक के कर्तव्योँ एवँ संदेशवाहक के प्रति राजा के कर्तव्योँ का विस्तृत वर्णन किया है। बाहरवीँ शताब्दी मेँ दिल्ली के चौहान वंश के प्रसिद्ध राजा पृथ्वीराज चौहान के दरबार के राज-कवि चंद्र बरदाई के द्वारा राजा जय चंद के दरबार मेँ दूत बन कर जाने का उल्लेख भी इतिहास मेँ आया है। दूत अथवा संदेश वाहक को मारना या हानि पहुंचाना अपराध था।

मोहम्मद गौरी ने दिल्ली का शासन अपने गुलाम कुतुबदीन ऐबक को सौँपा। कुतुबदीन ऐबक (1206-1211) ने अपने शासन को चुस्त-दुरुस्त करने के लिये तथा शाही संदेश अपने सुबेदारोँ और सिपाह-सालारोँ तक पहुंचाने और उनसे संदेश प्राप्त करने के लिये हरकारे नियुक्त किये थे। इन संदेशवाहकोँ के माध्यम से वह गज़नी मेँ मोहम्मद गौरी के सम्पर्क मेँ रहता था। इसके बाद अल्लाऊद्दीन खिल्जी (1296-1316) के शासन काल मेँ इस व्यवस्था मेँ और सुधार हुआ।

शेर शाह सूरी के शासन काल (1540-1545) मेँ उपरोक्त व्यवस्था मेँ और अधिक सुधार हुआ। जब शेर शाह सूरी द्वारा कलकत्ता से लाहौर तक ग्राँड-ट्रँक-रोड का पुनर्निर्माण करवाया गया, तब उसने हर दस कोस की दूरी पर दो घुडसवार हरकारे तैनात किये जो लिखित शाही फरमानोँ को तेजी से यहाँ से वहाँ पहुँचाते थे। इन हरकारोँ के लिए जगह-जगह सरायोँ का निर्माण शेर शाह सूरी ने करवाया। यदि देखा जाए तो आज जो डाक व्यवस्था है, उसने अपना आकार  शेर शाह सूरी के शासन काल मेँ ही लेना प्रारँभ किया था। मुगल काल मेँ इस डाक वयवस्था से विशेष छेड-छाड नहीँ की गई। सन 1616 मेँ सर थोमस रो मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार मेँ आया और उसने इंगलैड की महारानी की ओर से हिंदोस्तान मेँ व्यापार करने की इज़ाजत माँगी जो दे दी गई। इसके साथ ही भारत मेँ ईस्ट-ईँडिया कम्पनी और ब्रिटिश शासन के बीज बो दिये गए। इस प्रकार सर थोमस रो भी इंगलैँड की महारानी की ओर से संदेशवाहक ही था।

 इतिहासकार इस बात पर एक मत नहीँ है कि डाक शब्द की उत्पति कैसे और कहाँ से हुई। जहाँ तक अनुमान है डाक शब्द मध्य काल मेँ तत्कालीन हिंदी भाषा के डगर शब्द से बिगड कर बना है जिसका मतलब होता है रास्ता या राह। डाक हरकारे जब ग़्रांट-ट्रंक-रोड पर चलते थे, तब इन्हे डगरिया कहा जाने लगा होगा जिसका अर्थ है डगर पर चलने वाले लोग। बाद मेँ डगरिया शब्द बिगड कर डाकिया बन गया। जो संदेश उस समय डाक-वाहक ले कर जाते थे, उन्हे डाक कहा जाने लगा। देश के अधिकतर दूरवर्ती एवँ ग्रामीण क्षेत्रोँ मेँ आज भी डाक-वाहक पैदल ही डाक का आदान-प्रदान करते हैँ। ब्रिटिश ईस्ट इँडिया कँपनी के जमाने मेँ अंग्रेजोँ के साथ-साथ कई देसी रियासतोँ ने भी इस शब्द को अपना लिया।

मध्य काल मेँ आम जनता मेँ पत्र लिखने का रिवाज नहीँ था। केवल राजे-महाराजे तथा सँभ्राँत लोग ही संदेश भेजते थे। ये संदेश या तो भोजपत्र पर या फिर रेशमी वस्त्र पर लिखे जाते थे। विशेष संदेशवाहक इन संदेशोँ को गँतव्य तक पहुँचाते थे। इतिहास मेँ यह भी उल्लेख है कि सधाए हुए कबूतरोँ द्वारा भी संदेश भेजे जाते थे।

सन 1766 मेँ लार्ड क्लाईव ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की डाक वयवस्था की शुरुआत की। सन 1774 मेँ बंगाल प्रेसिडैँसी के अँतर्गत कलाकत्ता  जी.पी.ओ. की स्थापना लार्ड वारेन हेस्टिँग्ज के द्वारा की गई। सन 1786 मेँ मद्रास जी.पी.ओ. की स्थापना हुई जो मद्रास प्रेसिडैँसी मेँ था। इसके बाद सन 1793 मेँ बँबई जी.पी.ओ. की सथापना ईस्ट इंडिया कँपनी की बँबई प्रेसिडैंसी द्वारा की गई। इन तीनो प्रेसिडैँसियोँ मेँ उस समय डाक व्यवस्था का प्रबंधन इन प्रेसिडैंसियोँ द्वारा अपने स्तर पर स्वतंत्र रूप से किया जाता था। इसके अलावा भारत मेँ सैँकडोँ रियासतेँ थी, जहाँ डाक वयवस्था नाम की कोई चीज नहीँ थी।  इससे पूरे देश मेँ डाक व्यवस्था मेँ एकरसता नही थी।

 सन 1837 मेँ ब्रिटिश सरकार द्वारा एक एक्ट पास कर के तीनोँ प्रेसिडैंसियोँ की डाक व्यवस्था को एकीकृत कर के एक सिंगल डाक व्यवस्था की शुरुआत भारत मेँ की गई। इसके अंतर्गत पत्र भेजने के लिये शुल्क नकद मेँ चुकाना होता था। सन 1853 मेँ कलकत्ता से आगरा के बीच भारत की पहली टेलीग्राफ लाईन बिछी। इसी साल बँबई और थाने के बीच भारत की पहली रेल गाडी भी चली। उस समय भारत मेँ वाईसराय लार्ड डल्हौजी था। रेल गाडियोँ के प्रसार के साथ ही डाक की ढुलाई रेल गाडियोँ के माध्यम से शुरु हुई। आवश्यक संदेश तार द्वारा भेजे जाने लगे. सैमुअल मोर्स ने टेलीग्राफ का आविष्कार किया था। टेलीग्राम ऐसी व्यवस्था थी जिसके अंतर्गत मोर्स-की द्वारा विद्युत सिग्नलोँ का प्रयोग कर संदेश भेजे जाते थे। 15 जुलाई, 2013 को यह व्यवस्था समाप्त हो गई क्योँकि ई-मेल ने इसका स्थान ले लिया है।

डाक विभाग ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनोँ मेँ पूरे भारत को जोडने का क्राँतिकारी काम किया. डाक संदेशोँ के सहारे ही वे सभी लोग आपस मेँ सँपर्क मेँ रहते थे जो देश की स्वतंत्रता के लिये लड‌ रहे थे। इससे सँपूर्ण भारत देश एकता के सूत्र मेँ पिरो गया। गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने डाकघरनाम की एक प्रसिद्ध कहानी लिखी है, जिसमेँ उन विसम परिस्थितियोँ का मर्मिक चित्रण किया गया है, जिनसे दो-चार होते हुए उस समय के डाक-तार विभाग मेँ कार्यरत कर्मचारी अपनी ड्युटी करते थे। विभिन्न हिंदी फिल्मोँ मेँ भी पोस्टमास्टरोँ, डाकियोँ आदि का चित्रण किया गया है। पत्र ऐसा माध्यम था जिसके द्वारा अपने मन के भाव प्रकट किये जाते थे। प्रेमी-प्रेमिका जब शब्दोँ के द्वारा अ‍पनी बात नहीँ कह पाते थे, तब पत्रोँ के द्वारा अपनी भवनाएँ प्रकट करते थे। सरहद पर जब किसी फौज़ी को घर से पत्र आता था, तब पूरी युनिट मेँ खुशी का माहौल छा जाता था।

सिंधिया शासकोँ ने भी अपनी एक स्वतंत्र डाक व्यवस्था शुरु की थी, जिसे सिंधिया-  डाक का नाम दिया गया। सिंधिया डाक के अंतर्गत डाक टिकट भी जारी किये गए थे जिनका डाक के इतिहास मेँ अपना अलग महत्व है। इसी  प्रकार हिमाचल की सिरमौर रियासत सहित कुछ अन्य देसी रियासतोँ के द्वारा भी अपने डाक टिकट जारी किये गए थे।

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इस उपलक्ष्य मेँ जय-हिंद सीरीज के तीन रंगीन टिकट डाक विभाग द्वारा जारी किये गए। इन मेँ से एक पर अशोक स्तम्भ के शेरोँ, दूसरे पर भारत के तिरंगे झंडे का चित्र और तीसरे पर एक हवाई जहाज का चित्र छपा था।  इसके बाद तो डाक विभाग द्वारा आज तक हजारोँ रंग-बिरंगे डाक टिकट जारी किये जा चुके हैँ। डाक टिकट दो प्रकार के होते हैं। पहली श्रेणी को डैफिनिटिव डाक टिकट कहा जाता है- जो डाकघरोँ मेँ उपलब्ध सामान्य टिकट है, जिन का प्रयोग लोग  पत्रोँ और अन्य डाक वस्तुएँ भेजने के लिये करते है। दूसरी तरह के विशेष टिकटोँ को फिलैटली के टिकट कहा जाता है। फिलैटली के टिकट बहुत ही आकर्षक रूप-रंग के, बहु-आयामी झलकिया बताने वाले, पशु-पक्षियोँ, नदियोँ, झीलोँ, त्योहारोँ, महान हस्तियोँ, ऐतिहसिक भवनो आदि के उपर किसी मौके विशेष पर केवल एक बार ही विशेष समारोह आयोजित करके जारी किये जाते हैँ। दूसरी बार इन की छपाई नहीँ की जाती है। कुछ लोगोँ मेँ फिलाटेली के टिकट  इकट्ठा करने का शौक जुनून की हद तक होता है। टिकटोँ के संग्रह की जिला, राज्य, राष्ट्रीय एवँ अंतर्ररष्ट्रीये स्तर की फिलैटली प्रदर्शनियाँ डाक विभाग व अंतर्राष्ट्रीय डाक संगठनोँ  द्वारा समय-समय- पर आयोजित की जाती है। भारतीय राष्ट्रीय डाक म्युजियम नई दिल्ली मेँ है। जहाँ तक विश्व के पह्ले डाक टिकट की बात है, वह पैन्नी-ब्लैक था जो इंगलैंड मेँ सन 1840 मेँ जारी हुआ था। सन 1874 मेँ युनिवर्सल पोस्टल युनियन की स्थापना स्विट्जरर्लैँड के बर्न शहर मेँ हुई। वर्तमान मेँ इसके 192 सदस्य है। भारत भी इस संगठन का सदस्य है। वर्ल्ड-पोस्ट-दिवस दिनाँक 9 अक्तूबर को प्रति वर्ष मनाया जाता है। भारत मेँ प्रति वर्ष राष्ट्रिय डाक सप्ताह  9 अक्तूबर से 14 अक्तूबर तक मनाया जाता है।

15 अगस्त, 1972 को डाक विभाग ने एक अनोखा प्रयोग किया जब छ: अंकोँ से बने पिन-कोड की शुरुआत की गई। पूरे भारत को आठ पिन कोड क्षेत्रोँ मे बाँट दिया गया। पत्रोँ और अन्य डाक वस्तुओँ पर पते के अंत मेँ पिन-कोड लिखा जाने लगा, जिससे डाक वस्तुएँ इधर-उधर न भटक कर सीधे प्राप्तकर्ता को मिल जाए। डाक विभाग का यह प्रयोग अत्यंत सफल रहा है। इससे पूर्व एक ही जिले या तहसील मेँ एक ही नाम के कई अलग-अलग डाकघर होने की स्थिति मेँ डाक वस्तुएँ इधर से उधर भटकती रहती थी. इससे  डाक वस्तुओँ के वितरण मेँ देरी होती थी। पिन-कोड लिखा होने से डाक वस्तुएँ प्राप्तकर्ता को बिना विलँब के मिलने लगी।

1 अगस्त 1986 को डाक विभाग द्वारा स्पीड-पोस्ट शुरु की गई। आज स्पीड-पोस्ट ने डाक विभाग को एक नये अयाम तक पहुंचा दिया है। सन 1990 मेँ डाक विभाग द्वारा मुम्बई और चेन्नई मेँ औटोमैटिक मैल प्रोसैसिँग सैँटर स्थापित किये गये जहाँ द्रुत गती से पत्रोँ की छँटाई होती है।

पहले डाक-तार विभाग एक ही विभाग था परंतु सन 1985 मेँ भारत सरकार द्वारा बेहतर सेवाएँ देने के लिये डाक विभाग एवँ दूर संचार विभाग नाम के दो विभागोँ मेँ विभक्त कर दिया गया। आज-कल हवाई सेवा से जुडे शहरोँ के बीच डाक का आदान-प्रदान हवाई जहाजोँ के द्वारा होता है। भारतीय डाक विभाग के पास भी अपने हवाई जहाज है। कश्मीर मेँ डल झील मेँ हाऊस-बोट मेँ तैरता हुआ एक उपडाकघर है। एशिया का सबसे ऊँचा डाकघर हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पिति जिले के हिक्किम नामक गाँव मेँ स्थित है जो समुद्र तल से 4550 मीटर ( 15170 फुट) की ऊंचाई पर स्थित है।

यद्यपि सरकारी कर्मचारियोँ, सेना, पुलिस, सार्वजनिक क्षेत्रोँ के, सरकारी निगमोँ, निकायोँ, युनिवर्सिटियोँ, स्कूलोँ, कॉलेजोँ आदि के कर्मचारियोँ के लिये पहले ही डाक जीवन बीमा उपलब्ध था परंतु ग्रामीण क्षेत्रोँ की आवश्यकताओँ को देखते हुए ग्रामीण डाक जीवन बीमा नाम की एक नई योजना की शुरुआत दिनाँक 24 फरवरी 1995 को डाक विभाग  द्वारा की गई। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रोँ मेँ अत्यंत लोकप्रिय हो चुकी है। डाक जीवन बीमा और ग्रामीण डाक जीवन बीमा योजनाओँ के लिये डाक विभाग द्वारा एक अलग निदेशलय नई दिल्ली मेँ बनाया गया है।

सन 1995 के बाद डाक विभाग द्वारा  कई अलग-अलग प्रकार की योजनाएँ जैसे ई-पोस्ट, मिडिया पोस्ट, ई-मनीऑर्डर, इंस्टैंट मनीऑर्डर, डाईरैक्ट-पोस्ट, बिल मेल सर्विस, मोबाईल मनी-ट्रांस्फर, एक्सप्रैस पार्सल, बिजनैस पार्सल आदि सेवाओँ की शुरुआत की गई है। कुछ विदेशी कम्पनियोँ के साथ टाई-अप करके आई.एम.टी.एस. तथा मनी-ग्राम सेवाओँ को डाक विभाग के माध्यम से चलाया जा रहा है।  कोई भी व्यक्ति जिसके नाम पर पैसा विदेश से आया है, डाकघर को अपनी पहचान और लेन-देन कोड बता कर धन प्राप्त कर सकता है।

 सन 1993 से डाक विभाग मेँ उस समय एक नई क्राँती आ गई जब डाकघरोँ मेँ कँप्यूटर लगने शुरु हुए। इसके बाद डाक विभाग के प्रधान डाकघर, मुख्य डाकघर और उपडकघरोँ मेँ अधिकतर काम कँप्यूटरोँ पर ही होना प्रारँभ हुआ। इससे डाक सेवाओँ की गुणवत्ता बढी है। आजकल डाक विभाग के  प्रधान डाकघर, मुख्य डाकघर और बहुत से उप डकघर केंद्रीय बैँकिँग प्रणाली सी. बी. एस. से जुड चुके है और अगले आने वाले एक साल मेँ सभी बडे-छोटे डाकघरोँ के इस एकिकृत केंद्रीय बैँकिँग प्रणाली से जुड जाने की आशा है। सभी डाकघरोँ के कँप्पूट्रीकृत केंद्रीय प्रणाली सी.बी.एस. से जुड जाने के बाद डाक विभाग अपने ग्राहकोँ को और अछी सेवाएँ दे सकेगा।

डाक विभाग भारतीय सेना को भी अपना सक्रिय योगदान दे रहा है। डाक विभाग की एक शाखा आर्मी पोस्टल सर्विस के नाम से सशस्त्र सेना का एक अभिन्न अंग है। इसका प्रभारी मेजर जनरल रैँक का अफसर होता है। डाक विभाग के नियमित कर्मचारी एवँ अधिकारी प्रतिस्थापना पर आर्मी पोस्टल सर्विस मेँ जा सकते हैँ।
डाक विभाग ने आजकल अपने ए.टी.एम. भी लगाने शुरू कर दिये है। डाकघर बचत बैंक खाता धारकोँ को ए.टी.एम. कार्ड जारी किये जाते है जिससे पैसा निकालने के लिए डाकघरोँ के काऊँटरोँ पर लम्बी लाईन मेँ खडा नहीँ होना पड्ता है। देश मेँ पहला ए.टी.एम. चेन्नई मेँ लगा था। हिमाचल प्रदेश मेँ पहला ए.टी.एम. शिमला जनरल पोस्ट ऑफिस मेँ लग चुका है। अन्य चुने हुए डाकघरोँ मेँ भी ए. टी. एम. लगाने की प्रक्रिया चल रही है। निकट भविष्य मेँ देश मेँ एक डाक भुगतान बैँक भी बनने जा रहा है।

इस बात से इंकार नहीँ किया जा सकता कि देश के विकास मेँ विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रोँ के विकास मेँ डाक विभाग ने अपना बहुमुल्य योगदन दिया है। डाक विभाग जहाँ परँपरागत सेवाओँ को दूरस्थ स्थानोँ तक पहुँचा रहा है, वहीँ लघु बचत योजनाओँ के माध्यम से लोगोँ का अर्थिक स्तर भी बढा रहा है। साथ ही जहाँ लघु बचत योजनाओँ के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के लिये डाकघरोँ के माध्यम से धन जुटाता है, वहीँ दूसरी ओर राज्य सरकारेँ भी इस से लाभान्वित होती है क्योँकि राज्य सरकारोँ को केंद्र से ऋण उसके द्वारा लघु बचतोँ के माध्यम से जुटाए गए धन के निश्चित प्रतिशत के आधार पर मिलता है। वर्तमान मेँ बचत बैँक, 5 वर्षीय आवर्ति जमा, 1,2,3 व 5 वर्षीय सावधि जमा, लोक भविष्य निधि खाता, मासिक आय योजना, 5 व 10 वर्षीय रष्ट्रिये बचत योजना, 100 महीने के किसान विकास पत्र, सुकन्या समृधि योजना मेँ धन निवेश कर के लाभान्वित हो सकते हैँ।

सन 1947 मेँ जब भारत स्वतंत्र हुआ था, तब पूरे भारत मेँ मात्र 23,344 डाकघर थे। अब पूरे भारत वर्ष मेँ विभिन्न श्रेणियोँ के 1,55,000 से ऊपर डाकघर है जो कश्मीर, हिमाचल, सिक्किम, अँडेमान-निकोबार जैसे दुर्गम क्षेत्रोँ सहित देश के विभिन्न भागोँ मेँ स्थित है। जहाँ तक मानव सँसाधन का प्रश्न है, युवाओँ मेँ डाक विभाग मेँ सेवा करने की प्रबल लालसा देखी गई है। पदोँ की प्रकृति को ध्यान मेँ रखते हुए अलग-अलग स्तरोँ पर भर्ती सँघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग तथा स्थानीय स्तर पर की जाती है।
                          
डाक विभाग जहाँ एक ओर सीधे-सीधे लाखोँ लोगोँ को रोजगार दे रहा है, वहीँ अन्य लाखोँ लोग डाकघर द्वारा चलाई जा रही बचत योजनाओँ के अभिकर्ता बन कर रोज़गार प्राप्त कर रहे हैँ। लाखोँ अन्य लोग अपरोक्ष रूप से डाक विभाग की सेवाओँ से लाभान्वित हो रहे हैँ।

डाक विभाग का नाम आते ही ईमानदारी की याद भी आ जाती है। डाक विभाग का जो विकास हुआ है उसका श्रेय डाक विभाग के इमानदार, मेहनती कर्मचारियोँ और अधिकारियोँ को जाता है जो इस विभाग की परँपरागत छवि को बरकरार रखते हुए इसे स्वाबलँबी बनाने मेँ जी-जान से जुटे है। निजि पत्र लिख्नने का रिवाज आजकल कम हो गया है। ई-मेल, मोबाईल और कूरियर के इस जमाने मेँ भारी प्रतिस्पर्धा का सामना डाक विभाग को करना पड रहा है परँतु इन सब से प्रतिस्पर्धा करते हुए भी डाक विभाग अपनी पुरानी परम्पराओँ का निर्वहन बखूबी कर रहा है और अपने लिये नए क्षितिज़ ढूंढ रहा है। डाकघर जन-मानस के बीच रचा-बसा है। एक गरीब आदमी भी डाकघर मेँ अपनत्व और अधिकार से आता है।  एक पत्र मेँ जो सँवेदनाएँ, जो भावनाएँ रची-बसी होती है, उनकी अनुभूति ई-मेल से अनुभव नहीँ होती है।

                                                                                               .....लेखक: प्रकाश गौतम 

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