Monday, 27 March 2017

अनमोल पानी कैसे बचाएं ? HOW TO SAVE VALUABLE WATER

                    अनमोल पानी कैसे बचाएं ?

      हर वर्ष अप्रैल महीना शुरू होते ही पूरे भारत से सूखे के समाचार आने लगते हैं। रेडियो, टेलीविज़न या अन्य प्रिंट मीडिया, हर ओर बस सूखे की ही चर्चा होती है। जब बरसात में सब कुछ ठीक ठाक लगने लगता है तो लोग सूखे को भूल जाते है।

      यूं तो चाहे शिमला हो या चंडीगढ़, दिल्ली हो या चेन्नई। हर नगर कस्बे मे पूरा साल भर ही पानी के नलकों के आगे हरी, नीली, पीली प्लास्टिक की बाल्टियों  की लाईनें लगी रहती है। घर में लगे नलों में तीसरे-चौथे दिन पानी आता है। बाहर गली मोहल्लों में पानी के टैंकर खड़े रहते हैं जहाँ अपनी बारी के लिए लोगों मे मारा-पीटी होती रहती है। ऐसे भी दृश्य टेलीविज़न पर सामने आए हैं जिनमें पानी भरने की बारी के लिए औरतें आपस में लात-घूंसे बरसाती हुई एक दूसरे के बाल नोचते हुए दिखाई दी।  

      पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। धरती पर जो भी जीवन है, उसका आधार ही  पानी है। इसी तथ्य को ध्यान में रख कर नासा सहित दुनिया भर के वैज्ञानिक ब्रह्मांड में ग्रहों और उपग्रहों पर जीवन की खोज कर रहे हैं।

      हमारी धरती पर लगभग तीन चौथाई पानी है और एक चौथाई जमीन। पानी अधिकतर महासागरो, सागरों, झीलों, ग्लेशियरों, नदियों, तालाबों, झरनों, और जमीन के नीचे सतही पानी के रूप में है। महासागरों, सागरों का पानी खारा हैं जो पीने और सिंचाई के योग्य नहीं है। बहुत सी झीलें भी खारे पानी वाली है। भारतवर्ष में उड़ीसा राज्य में चिलका झील और राजस्थान में साँभर झील खारे पानी की झीले है। धरती पर मीठा पानी मात्र 2.5 प्रतिशत ही है। मीठे पानी के सबसे बड़े स्रोत ग्लेशियर अथवा हिमनद है। हिमनद अधिकतर उत्तर ध्रुविय आर्कटिक, दक्षिण ध्रुवीय अंटार्कटिक क्षेत्रों तथा हिमालय, आलप्स, एंडीज़ सहित अन्य ऊंची-ऊंची पर्वत मालाओं पर स्थित है। नदियों, झरनों, मीठे पानी की झीलों और वातावरण में धरती पर उपलब्ध पानी का 0.3 प्रतिशत से भी कम पानी है।

      सड़कों पर वाहनों की संख्या में हजारों गुणा बढ़ोतरी हुई है जिनसे उत्सर्जित होने वाले धुएँ, कार्बन डाई-ऑक्साइड, सल्फर-डाइऑक्साइड आदि घातक योगिकों ने वातावरण में ग्रीन हाऊस जैसे कुप्रभाव उत्पन्न किए है। धरती का तापमान बढ़ने से अल-नीनों और ला नीना जैसे प्रभाव उत्पन्न हुए है.

      पिछले पचास वर्षों में अंधाधुंध औद्योगीकरण के चलते धरती के वातावरण का तापमान कई डिग्री सेल्सीयस बढ़ा है।  ऐसा होने के कारण  ग्लेशियरों के पिघलने की दर तेज हुई है। ग्लेशियरों का क्षेत्रफल सिकुड़ा है। भारत मे गंगोत्री ग्लेशियर सिकुड़ कर आधा रह गया है।  इस कारण एक ओर जहां नदियों का पानी कम हुआ है, वहीं दूसरी ओर मॉनसून और सीजनल वर्षा के ऊपर भी वातावरण का  प्रतिगामी असर पड़ा है। नदियों का जलग्रहण क्षेत्र कम हुआ है। कुछ नदियां तो सीजनल बन कर रह गई है जिनमें शरद ऋतु के अंत से ले कर ग्रीष्म ऋतु के अंत तक बालू, कंकड़  और पत्थर ही दिखाई देते हैं.

      शहरों में जनसंख्या में कई गुणा बढ़ोतरी हुई है। इस कारण शुद्ध पानी  की मांग शहरों में बढ़ी है। दूसरी ओर शुद्ध पानी की आपूर्ति कम हुई है।

      ग्रामीण क्षेत्रों में भी जीवन शैली में परिवर्तन और कृषि के लिए पानी की भारी मांग के चलते सतही भू-जल का अंधाधुंध दोहन हुआ है। इस का परिणाम यह हुआ है की देश के अधिकतर हिस्सों में सतही पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया है। अब बहुत गहराई तक कुएं खोदने पड़ते है तब जा कर पानी निकलता है। जो पानी निकलता भी है वह खारा होता है और पीने योग्य नहीं होता है। इस बात का साफ पता उस समय चलता है जब हम ऐसे पानी को हाथ धोने या नहाने के लिए प्रयोग करते है। ऐसे पानी से साबुन या डिटेर्जैंट झाग नही बनाता। उल्टे, शरीर  पर चिपचिपा पदार्थ जम जाता है।

      पानी की बरबादी का एक बड़ा कारण पाईपों और टंकियों से होने वाला जल रिसाव है। उदाहरण के रूप में यदि किसी घर की 1000 लीटर क्षमता की टंकी से यदि बूंद-बूंद रिसाव हो रहा हो तो वह चौबीस घंटे में खाली हो जाएगी। रिसाव यदि धार के रूप में है तो पाँच-छ: घंटे में टंकी खाली हो जाएगी। हम देखते हैं कि जगह-जगह पानी की पाईपों से फव्वारे छूटते रहते हैं। इससे होने वाली पानी की बरबादी का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

      कुछ ऐसे बी मामले सामने आए हैं जब जल आपूर्ति के कार्य में लगे कुछ कर्मचारी होटलों इत्यादि को सामान्य  से अधिक पानी की आपूर्ति करते रहते हैं और आम जनता को कम पानी छोडते हैं।

      जब से शहरों और गाँव में  फ्लश फ्लश शौचालयों बने हैं, तब से पानी का अंधाधुंध प्रयोग बढ़ा है। पहले तो शहरों तक ही फ्लश शौचालय सीमित होते थे। धीरे धीरे छोटे कस्बों और गाँव तक इनका  चलन बढ़ा हैं। यह अच्छी बात है कि शौचालयों के इस्तेमाल से बाहर खुले में गंदगी नहीं फैलती और इससे महामारियाँ नहीं फैलती। फ्लश शौचालयों के इस्तेमाल से जीवन शैली भी आसान हो जाती है। सुविधा भी होती है और समय की भी बचत होती है।

      पर यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि पीने  और अन्य आवश्यक उपयोग के लिए इतना पानी खर्च नहीं होता जितना फ्लश शौचालयों से मल बहाने के लिए। उदाहरण के लिए मान लीजिये किसी एक व्यक्ति को आदर्श परिस्थितियों में पीने, खाना बनाने और नहाने के लिए दिन में पचास लीटर पानी की आवश्यकता होती है तो मोटे तौर पर इन सब कार्यों  के लिए चार बाल्टी पानी की आवश्यकता होती है। परंतु जब वही व्यक्ति शौचालय का इस्तेमाल करता है तो पूरे दिन में सौ लीटर पानी टॉइलेट में बहा देता है। कभी-कभी तो लोग मात्र थूकने के बाद ही आठ-दस लीटर पानी फ्लश से बहा देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि पीने और अन्य इस्तेमाल की लिए जितने पानी की आवश्यता होती है उस से अधिक पानी फ्लश शौचालयों में बह जाता है।

       बड़े-बड़े होटलों के  फ्लश शौचालयों में तो  इतना पानी व्यर्थ में बह जाता है कि अनुमान भी नहीं  लगाया जा सकता। लोग घंटो शावर की बौछारों में नहाते रहते हैं। बाहर नुक्कड़ पर बच्चों और औरतों का झुरमुट सूखे नल को टुकुर-टुकुर निहारता  रहता है।

      जब लोग पीने के पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस जाते हैं तो फ्लश शौचालयों में अंधाधुंध पानी का इस्तेमाल करने का कोई औचित्य नहीं है।

      पानी का एक बड़ा दुरुपयोग कपड़े धोने के लिए होता है। जब से वाशिंग मशीनों का प्रयोग शुरू हुआ है इनके द्वारा कपड़े धोने के लिए अंधाधुंध पानी का प्रयोग हो रहा है। कपड़े खँगालने के बाद इस पानी को घर में ही रिसाईकल कर के टॉइलेट में इस्तेमाल किया जा सकता है परंतु अधिकतर लोग ऐसा नहीं करते। पाँच-सात लोगों के परिवार की बात करें तो पानी कि खपत और बचत का अनुमान  आप सवयं लगा सकते हैं।    आप सोचिए कि  यदि सब लोग पानी का ऐसा तर्कसंगत प्रयोग करने लगे तो हर शहर में पानी की आपूर्ति कितना स्कारात्मक असर पड़ेगा।

      यह सिद्धान्त केवल उन शहरों तक ही उपयोगी है जहां सरकारी स्तर पर एकीकृत सीवरेज प्रणाली उपलब्ध है। जहां लोगों ने अपने-अपने सेप्टिक टैंक बना रखे हैं, वहाँ साबुन और डिटर्जैंट युक्त पानी सैप्टिक टैंक मैं डालना उचित नही होगा।
     
      फ्लश शौचालयों में फ्लश से बहाया जाने वाला पानी कोई सामान्य पानी नहीं होता। यह वह पानी होता है जिस की आपूर्ति सरकार के जल-विभाग और नगर निगमों और नगरपालिकाओं द्वारा की जाती है। इन के द्वारा पानी की आपूर्ति करने पर भारी भरकम रकम खर्च होती है। पानी को पीने योग्य बनाने में बहुत श्रमशक्ति लगती है, बहुत समय लगता है, बहुत बिजली का प्रयोग होता है, बहुत अधिक धन खर्च होता है और बहुत से संसाधन लगते है।

      फ्लश शौचालयों में पानी की खपत को रोकने के लिए बायो-टॉइलेट एक विकल्प हो सकता है। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि फ्लश शौचालयों और सेप्टिक टैंकों के डिजाईन में इस प्रकार परिवर्तन किया जाए कि  मल विसर्जन के लिए कम से कम पानी की खपत हो। इस बात के ऊपर आई॰ आई. टीज़ और अन्य यूनिवर्सिटीयों में शोध करने की आवश्यकता है।
     
      दूसरी ओर, फ्लश शौचालयों में वैकल्पिक प्रवाह जल  की आपूर्ति किसी शहर में स्थानीय तौर पर ही प्रहले से प्रयोग हुए, किचन और नहाने से निकले पानी को सरकारी स्तर पर रिसाईकल कर के की जा सकती है। अभी तक न तो किसी राज्य सरकार ने इस बारे में सोचा है, न ही किसी रिसर्च करने वाले का ध्यान इस ओर गया है।

      एक अन्य उत्तम व्यवस्था सरकारी स्र पर यह हो सकती है कि पानी की आपूर्ति की दोहरी व्यवस्था लागू की जाए। अर्थात पीने के पानी की आपूर्ती अलग पाईप लाईनों द्वारा और कपड़े धोने और टॉइलेटस में इस्तेमाल होने वाले पानी की व्यवस्था अलग पाईप लाईनों द्वारा हो। इसके लिए अलग अलग स्टोरेज टंकिया रखनी पड़ेगी। प्रारम्भ में इस व्यवस्था को लागू करने पर भारी ख़रच आएगा पर बाद में  इससे पीने के पानी की फिल्टरेशन और  आपूर्ति के ऊपर बहुत कम लागत आएगी। पानी को संसाधित करने में खर्च होने वाली बिजली की भी बचत होगी। इस व्यवस्था का लाभ यह होगा कि लोगों को पीने और किचन मे प्रयोग हेतु प्रतिदिन पानी उपलब्ध हो सकेगा।
     
      जब हम सतही जल स्र की बात कराते हैं तब मन में यह प्रशन उठता है कि जब इतनी बाढ़ आती है, बड़े-बड़े भू-भाग महीनों पानी में डूबे रहते हैं तब सतही जल का स्र क्यो नही बढ़ता? इसका उत्तर है जमीन में कृत्रिम खादों का प्रयोग, औद्योगिक प्रदूषक योगिकों का जमीन में लगातार रिसाव उसे बंजर बनाता जा रहा है। इस से मिट्टी के रिसाव रंध्र अवरूद्ध हो जाते हैं। जमीन की निचली सतह सपाट पत्थर जैसी हो जाती है। जिस कारण बरसात के दिनों में बारिश व बाढ़ का पानी जमीन के अंदर शीघ्र नहीं रिसता और सतही भूजल के स्तर में बढ़ोतरी नहीं होती। बाढ़ और वर्षा का पानी जमीन के ऊपर-ऊपर से व्यर्थ बह जाता है।

      जल-ग्रहण क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण कार्यों से भी सतही जल  के स्तर में कमी हुई है। जहां पहले परंपरागत तालाब होते थे, आज वहाँ मल्टी स्टोरी कालोनियां और भवन खड़े है। पहले आम तौर पर हर गाँव  में एक या दो तालाब तो अवश्य ही होते थे पर वर्तमान में तालाबों का नामो-निशान मिटता जा रहा है।

      जनसंख्या में बढ़ोतरी, आवासीय कालोनीयों के अंधाधुंध निर्माण, जीवन शैली में परिवर्तन, शहरीकरण के कारण पानी का बहुत अधिक जमीनी दोहन हुआ है। लाखों नए हैड पंप लगे हैं। भारत के कई शहर तो पानी की आपूर्ति के लिए पुरातन काल से ही सतही पानी के ऊपर ही निर्भर रहे हैं। सतही भू-जल का स्तर सामान्य से बीसियों फुट नीचे गिरा है। इससे पेय जल के लिए त्राही माम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। सिंचाई के पानी की बात तो छोड ही दीजिये।

       अत: आज आवश्यकता इस बात की है कि परंपरागत  पानी के  संसाधनों की ओर भी ध्यान दिया जाए और इनका  पुनरुद्धार किया जाए.

      यह आवश्यक है कि ग्रामीण क्षेत्रों में चेक डैम बनाएँ जाएँ जिस से धरती के सतही जल  स्तर में बढ़ोतरी हो सके।

      पहाड़ी राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर की बात करे तो 1990 से पहले  रसात के मौसम में पहाड़ी ढलानों से अचानक  शुद्ध पानी के सोते धरती से फूट पड़ते थे जो चार-पाँच महीने तक बहते रहते थे। बावड़िया और कुएं पानी से लबालब भरे रहते थे। आज न तो पानी के सोते ही फूटते हैं, न लोग ही इस ओर अधिक ध्यान देते हैं। जो बावड़ियाँ और कुएं बचे भी है वे शैवाल और काई से भर गए हैं और मछरों के पनपने के अड्डे बन गए हैं। गावों  के लोग वर्ष में दो तीन बार मिल कर कुओं और बावड़ियों की सफाई करते थे पर आज नई पीढ़ी को तो यह भी पता नहीं कि क्या इन जल स्रोतों से क्या कभी उनके पूर्वज पीने के लिए और जीवन की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए  लिए पानी भरते थे।

      हिमालयी राज्यों में पानी की कमी नही हैं पर पानी अधिकतर नीचे घाटियों में बहने वाली नदियों और खड्डों में है। अधिकतर गाँव और शहर ऊपरी क्षेत्रों में बसे हैं जैसे शिमला, मसूरी, नैनीताल आदि। नदियों और खड्डों से पानी को बिजली के पंप चला कर उठाना पड़ता है जिस पर भारी भरकम खर्च आता हैं। यहाँ लोगों की हालत पपीहे की तरह है। यदि दोहरी पानी की आपूर्ति व्यवस्था लागू होती है, जैसा कि ऊपर सुझाया गया है, तो शहरों में कम से कम चालीस प्रतिशत बिजली बचेगी जो अन्यत्र उपयोग में लाई जा सकती है।

      विभिन्न सरकारों का यह प्रशंसनीय  कदम रहा है कि उन्होने जल संसाधित और आपूर्ति करने के लिए एक अलग जल विभाग बना कर लोहे की पाईपों के जरिये घर-घर तक शुद्ध पानी की आपूर्ति की व्यवस्था की है। परंतु यह एक आदर्श स्थिति है और पानी के संसाधन इतने नही है कि हम अंधाधुंध, निरंतर, अनंतकाल तक उनका उपयोग कर सके।

      भारत में अंधाधुंध औद्योगीकरण के चलते बड़े-बड़े शहरों से फ़ैक्टरीयों से उत्सर्जित विषैले योगिकों से युक्त जल नदियों में बहाया जाता है। घरों से और आवासीय इकाईयों से निकलने वाला जल सीधे नदियों में बहाया जाता हैं जिस से नदियां गंदा नाला बन कर रह गई हैं। यमुना नदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यमुना के किनारे कभी भगवान श्री कृष्ण अठखेलिया करते थे, बासुरी बजाते थे। अगर आज श्री कृष्ण होते तो बांसुरी बजाना तो दूर, शायद नाक पर रुमाल रख कर यमुना किनारे से निकलते।

      मानव मल को नदियों में उत्सर्जित करने के बजाए इसका इस्तेमाल वैज्ञानिक ढ़ंग से ट्रीट करके जैविक खाद बनाने के काम में भी हो सकता है। दुनियाँ के कुछ देशों जैसे डेनमार्क, फिनलैंड, नॉर्वे इत्यादि में मल को ट्रीट कर के सूखी ओर्गेनिक खाद बनाई जाती है। ऐसा करते समय जो मीथेन गैस निकलती है उससे बिजली पैदा की जाती है। भारत में भी उन देशों से प्रेरणा व अनुभव ले कर ऐसे  प्रयोग किए जा सकते हैं।

      जैविक खाद भारी मात्रा में बनाने पर रासायनिक खादों का प्रयोग कम होगा।  लोगों की आर्थिक स्थिति बढ़ेगी। जमीन बंजर होने से बची। ट्रीटमेंट प्लांटों से निकालने वाली  यूरिया से रासायनिक खाद बनाई जा सकती है। अमेरिका में कुछ बेरोजगार युवा मल और घर के कूड़े-कचरे से जैविक खाद बना कर मालामाल हो गए हैं। ऐसी जैविक खाद बना कर वे बेच रहे हैं। वे लोग न केवल पैसा कमा रहे हैं बल्कि पर्यावरण के संरक्षण के लिए अपना अमूल्य योगदान कर रहे हैं।

      ट्रीटमैंट के पश्चात पानी को पुन: प्रयोग योग्य बनाया जा सकता है।  इसे कृषि कार्यों  में उपयोग में लाया जा सकता है।

      यह  मात्र किसी सरकार का ही दायित्व नहीं है  कि ऊपर सुझाए गए उपायों को अपनाएं।  अपितु यह हर नागरिक का कर्तव्य है कि पानी के संरक्षण के लिए हर संभव उपक्रम करे। यदि आज हम पानी के लिए इतने त्रसित हो रहे हैं तो सोचिए दस-बीस वर्ष बाद क्या हाल होगा।

                                                                               Written by : Prakash Gautam

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