Thursday, 23 March 2017

Mystery of Dreams - स्वप्न रहस्य

    
सपने को समझने और उनका अध्ययन करने के विज्ञान को ओनीरोलोजी (ONEIROLOGY) कहते हैं। ONEIRO का ग्रीक भाषा में अर्थ होता है - सपना (Dream)।  आमतौर पर जब  हम नींद में होते हैं तो हम सब सपने देखते हैं। कई बार हम जागते हुए भी सपने देखते हैं। हर जीवित व्यक्ति सपने देखता है। हमें सपने देख कर कभी डर लगता है और कभी हम खुश हो जाते हैं। सपने जागी आँखों के भी होते हैं पर उन सपनों को हम वास्तविक सपने नहीं कह सकते। ऐसी अवस्था विचारों की एक सिस्टेमैटिक एकाग्रता होती है। यह वास्तविक सपनों से अलग एक स्थिति है। यह योजना बनाने की एक प्रक्रिया है।
                     
प्राचीन काल से मनुष्य के मन में सपनों के प्रति बड़ा ही कौतूहल रहा है। हमारे पुराणोँ और अन्य धर्म  ग्रन्थों मेँ सपनों का उल्लेख मिलता है। बड़े-बड़े ऋषि मुनियों और विचारकों का रातो रात मन परिवर्तन सपने देख कर हो गया। इतिहास गवाह है कि कई राजाओँ, महाराजाओं, महारानियों  ने कोई विशेष सपना देखने के बाद बड़े बड़े मंदिर, मठ, धर्मशालाएँ, प्याऊ, तालाब बनवाए, यहाँ तक कि कुछ ने तो कोई सपना विशेष देखने के बाद सन्यास ही ग्रहण कर लिया।

हम स्वप्न क्यों देखते हैं ?

हर किसी के मन में यह विचार कभी न कभी आता है कि जब हम सोए होते हैं, तभी  हमें सपने  क्यों दिखाई देते हैं ?  जबकि सोते हुए हम जान-बूझ कर कुछ नहीं सोच रहे होते हैं। सपने देखते समय हमारा शरीर शिथिल पड़ा होता है। पर हमारा मन बहुत आधिक सक्रिय होता है।

हम जितने सपने देखते हैं, उनमें से लगभग दस प्रतिशत सपने ही सकारात्मक होते हैं और अन्य नकारात्मक।  सकारात्मक सपना देखने के बाद हम उस सपने को अधिक देर तक याद नही रख पाते क्योंकि हमारा मन-मस्तिष्क इस प्रकार के सपनों को नजर-अंदाज कर देता है, यह सोच कर कि इस प्रकार के सपनों से हमें कोई खतरा नहीं है। दूसरी ओर जब हम नकारात्मक या डरावने सपने देखते हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क चौकन्ना हो जाता है और डरावने सपने को एक खतरा समझ कर प्रतिक्रिया करता है। हमारे शरीर में स्थित एड्रीनल हार्मोनल ग्रंथिया खतरे से लड़ने के लिए सामान्य से अधिक एड्रीनल हारमोन स्रावित करने लगती है।

एक बात है जो बहुत ही सपष्ट रूप से समझ में आती है। वह यह है कि सपने देखते समय सपने देखने वाला किंकर्तव्य-विमूढ़ अवस्था में होता है। वह खुले रूप में अपनी इच्छा के अनुसार अधिकतर कुछ नही कर रहा होता है। परंतु जो छवियाँ उसे सपनों में दिखाई दे रही होती है वे पूरी तरह उस के ऊपर हावी होती है। उन्ही  छवियों का राज सपनों की दुनिया पर होता है। वही छवियाँ सपने देखने वाले व्यकति के शारीरिक क्रिया-कलाप को नियंत्रित करती है। 

कोई दूसरा व्यक्ति यह समझ नहीं  सकता की सपने देखने वाले व्यक्ति के मन में क्या हलचल चल रही है। दूसरा व्यक्ति तो बस सपने देखने वाले व्यक्ति  के हाव-भाव देख कर कुछ अनुमान ही लगा सकता है।

स्वप्न की अवस्था में अवचेतन मन की क्रियाशीलता

हर व्यक्ति के मन के दो हिस्से होते हैं। एक तो चेतन और दूसरा अवचेतन। सोते समय अवचेतन मन बहुत क्रियाशील हो जाता है। चेतन मन की क्रियाशीलता  बहुत कम हो जाती है। चेतन मन उन सभी क्रियाओं को नियंत्रित करता है जिन्हे हम अपनी इच्छा के अनुसार करना चाहते हैं, या कर सकते हैं। जब व्यक्ति सोया होता अवचेतन मन उन सभी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है, जो चेतन मन के नियंत्रण में नहीं होती है - जैसे पाचन क्रिया, दिल की धड़कन, सांस लेना, किडनी और लीवर का संचालन, हार्मोनल और अन्य ग्रंथियाँ
हमारे मस्तिष्क के कई भाग होते हैं। मस्तिष्क  के बीच के  निचले हिस्से मे एक जोडी ट्यूब की शक्ल वाला एक अंग होता है जिसे हिप्पोकैंपस  कहते है। इसी अंग में अस्थाई और स्थाई यादें रहती है। इस अंग में एक निरंतर चलने वाली क्रिया चलती रहती है। हम साधारण शब्दों में कह सकते हैं की हिप्पोकैंपस एक लाईब्रेरी  की तरह है और हमारा मन एक लाईब्रैरियन है जो हर क्षण अनुभव और याद रूपी किताबों की झाड-फूंक करता रहता है तथा उन्हे हिप्पोकैंपस के विशेष कोशिकाओं के एक शेल्फ से दूसरी सेल्फ में रखता रहता है, उलटता-पलटता रहता है। हिप्पोकैंपस उन याद और अनुभव रूपी किताबों में क्या लिखा है, को पढ़ कर उस का नाट्य-मंचन करता रहता है। साथ ही मस्तिष्क के अन्य हिस्सों को भी उचित निर्देश दे कर क्रियाशील बनाए रखता है।

कभी कभी सपनों मेँ ऐसी अजीबो गरीब चीजें दिखाई देती है जो हम लोगों ने कभी अपनी आम जिंदगी में देखी ही नहीँ होती है। कभी इतनी खूबसूरत चीजे और दृश्यावलियाँ देखने को मिलती है की हम सोचते हैं इन्हें बस देखते ही रहे और हमारा सपना कभी टूटे  ही नहीँ।

अभी तक कोई ऐसा उपकरण नहीं बना है जो किसी सपने देखने वाले व्यक्ति के मन-मस्तिष्क से सपनों की तस्वीर उतार ले अथवा उसे रिकॉर्ड कर ले। हम केवल मात्र यह समझ ही सकते हैं की जब व्यक्ति सपने देख रहा होता है तो उस की बंद पलकों  के नीचे आँखों के गोले बहुत ही तेजी से घूम रहे होते हैं।  जितनी तेजी से आंखो के गोले घूमते हैं, उतनी ही तेजी से हमारा मस्तिष्क सपने में दिखाई देने वाली चीजों के प्रति  प्रतिक्रिया कर रहा होता है। शरीर तो अधिकतर अविचल पड़ा होता है।

स्वप्न में मन का व्यवहार

सपने देखते समय साँसे कभी तेज चलती है और कभी मद्धिम। आँखों की पुतलियों और साँसो के चालन में एक लयबद्धता होती है। कोई व्यक्ति कितनी देर तक  सपने देखता है, यह निश्चित नहीँ है। सपना एक मिनट का भी हो सकता है और एक घंटे का भी। कभी-कभी एक ही सपना क्रमिक रूप से एक सीरीज में दिखाई देता हैं पूरी रात भर एक ही सपना धारावाहिक रूप में दिखाई दे सकता है।

सपने देखते समय, सपने की प्रकृति के अनुसार कभी कभी नींद में बड़बड़ाने भी लगता है। कभी-कभी रोने, हंसने या ज़ोर से चिल्लाने लगता है। कभी-कभी ऐसे दृष्टांत भी हुए हैं की सपनें देख रहा वयक्ति साथ सोए व्यक्ती को थप्पड़ ही मार दे या लात-घूंसे ही चला दे। कभी लगता है की हम आसमान की ऊंचाई से गिर गए हों या उफनती नदी के बहाव में बहते जा रहे हों।

कभी कभी तो ऐसा भी होता है की व्यक्ति सपनों के वशीभूत हो कर सोते-सोते चलता रहता है तथा ऐसी अजीब हरकतें करता रहता है की देखने वाले की  हंसी छूट जाए। ऐसे भी दृष्टांत सामने आए हैं की कोई व्यक्ति ड्राईविंग नहीं जानता पर सपने में उठ कर वह किसी की गाड़ी की चाबी निकाल कर मजे से सोए-सोए ही गाड़ी चलाने लगता है।

एक ऐसा भी उदाहरण सामने आया जब नींद में ही एक व्यक्ति उठा और  घर से कुछ दूर जा कर एक तालाब में तैरने लगा। जबकि वास्तविक जीवन में उसे पानी से बहुत डर लगता था। जब लोग पीछे से आ कर चिल्लाने लगे की पानी से बाहर आओ, तो उसका सपना टूट गया और वह तैरना भूल कर डूबने लगा। लोगों को उसे पानी में कूद कर बचाना पड़ा।

सपने हम जान बूझ कर नहीं  देखते। सपने देखने के ऊपर हमारा कोई वश नहीं है। कई बार हम सोचते हैं हमें सपने में एक खूब सूरत दृश्य दिखाई दे। मान लीजिये हम कल्पना करेँ कि हमेँ अपनी प्रेमिका दिखाई दे पर बहुत सोचने के बाद भी  वह  नही दिखाई देती। दूसरी तरफ किसी सपने में ऐसा  दिखाई देता है की हम  किसी भिखारिन या बूढ़ी औरत के साथ के साथ प्रेमालाप कर रहे है। जब हम जागते हैं तो हम अपने आप को कोसते हैं, दुआ करते हैं की जागृत अवस्था में भगवान कभी ऐसा न करवाए। 

सपने का अंत या तो सपने की चरम सीमा पर होता है अथवा तब होता है जब कोई बाहर का व्यक्ति अपनी आवाज निकाल कर अथवा सपने देखने वाले व्यक्ति के शरीर को छू कर सपने देखने वाले व्यक्ति की स्वपन-तंद्रा में विघ्न डालता है।

जो सपने हम देखते हैं वे सब हमें याद नहीँ रहते। केवल कुछ ही  सपने याद रहते हैं। जो याद रहते भी हैं, वे बहुत लंबे समय तक याद नहीं रहते।

स्वप्नों की विचित्रता

सपनों की कई श्रेणीयां  होती है। जैसे आतंक भरे सपने, भयानक सपने, जादू भरे सपने, मादक सपने, कभी लगता है हम हवा में उड़ रहे है, कभी लगता है पानी में डूब रहे है, कभी लगता है कोई राक्षस हमेँ पकड़ रहा है, कभी साँप काटता दिखाई देता है। कभी लगता है हम मर चुके हैं और हमारे परिजन विलाप कर रहे है। कभी कोई परिजन मर गया लगता है। कभी मृत परिजन या कोई अन्य मृत व्यक्ती सपने में दिखाई देता है। कभी हम किसी डरावनी चीज को किसी डंडे या हथियार से मार रहे होते है पर वह ठहाके लगा कर हमारी ओर बढ़ता रहती है। फिर हम चीख पड़ते हैं। ऐसी चीखें सपने में तो भयानक और तेज होती है वर वास्तव में नजदीक लेते या बैठे व्यक्ति को सपने देखने  वाले की बस हल्की सी चीख सुनाई देती है। कभी ज़ोर से चीखने की आवाज़े आती है।

सपने सिर्फ डरावने ही नहीं होते बल्कि सपनों में ऐसे ऐसे नुसख़े मिल जाते हैं की कोई अनसुलझी गुत्थियाँ सुलझ जाती है। अधिकतर वैज्ञानिकों ने अपने आविष्कार उनके द्वारा देखे गए सपनों के आधार पर ही किए है। सिलाई मशीन और आईंस्टीन की रेलेटिविटी का सिद्धांत इनके उदाहरण है।

भारतीय दर्शन और उपनिषदों में उल्लेख मिलता है की सपने व्यक्ति की आंतरिक अतृप्त और अपूर्ण अभिलालाषाओं का परिणाम है। जागृत अवस्था में हम सामाजिक, धार्मिक, नैतिक और कानूनी  बंधनो में बंधे होते है। सोते समय ये सब बंधन हमारी सोच के ऊपर हावी नहीं  होते हैं। उदाहरण के लिए, कभी कभी ऐसा भी हो सकता है की एक पति-पत्नी एक ही बिस्तर पर सोए होते हैं पर सपनों में वे पर पुरुष अथवा पर-स्त्री के साथ होँ।

कभी कभी एक ही सपना कुछ अंतराल के बाद  बार-बार दिखाई देता रहता है। जैसे कोई मृत सगा -सम्बन्धी कुछ मांग रहा हो या कुछ दे रहा हो । ऐसा तब होता है जब हमारे मन में ऐसी बात आती है की उक्त मृत व्यक्ति के लिए हम कुछ करना चाहते थे पर परिस्थितिवश उक्त कर्तव्य का निर्वाह कर नहीं पाए। यह मन की कसक या कचोट होती है। भारत में हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोग तब उक्त मृत व्यक्ति की याद मे श्राद्ध इत्यादि कर्म करते है, प्याऊ बनवाते हैं, बावड़िया खुद्वाते हैं या विभिन्न प्रकार के  तंत्र-मंत्र करते हैं। अथवा गले में जंतर, गंडे, ताबीज पहनते हैं। इनका मनोवैज्ञानिक असर होता है।  फिर, वह सपना दिखाई देना बंद हो जाता है। कोई डरावनी चीज सपने में देखने परजैसी भी हमारी धार्मिक आस्था होती हैहम गायत्री मंत्र का जाप करने लगते है या बाईबाल पढ़ने लगते है, या फिर कुरान की आयतें पढ़ने लगते हैं। 

सपनों का परिणाम त्वरित रूप से देखने पर उस समय मिलता है जब कोई बच्चा सपने देख पर बिस्तर पर ही पेशाब कर देता है या सोते समय कोई व्यक्ति चीख पडता है अथवा घिघियाने लगता है। इस प्रकार के सपने प्राय: रात्री के अंतिम प्रहर में तीन बजे से लेकर सूर्योदय तक दिखाई देते हैं। उस समय शरीर में कोर्टिकोसोल, टेस्टीस्टिरोन ईस्ट्रोजन नाम के हारमोन अधिक सक्रिय होते हैं जो शरीर में मादकता और अलसाव उत्पन्न करते हैं।

जितने सपने हम देखते हैं उन में से लगभग 10 प्रतिशत सपने सेक्स य कामेच्छा से संबन्धित होते है, जो रूप, रस गंध, शब्द  स्पर्श की इंद्रियातीत अनुभूति से अभिप्रेरित होते हैं।  कोई साधु सन्यासी या साध्वी, ऋषि-मौनी, मठाधीश यह नहीं कह सकता की उस ने सन्यास ग्रहण करने के बाद कभी सेक्स से संबन्धित अथवा रूप, रस गंध, शब्द  स्पर्श की अनुभूति से अभिप्रेरित सपने नहीं  देखे है।

कुछ विचारक तो यह मानते हैं की सेक्स अथवा रूप, रस गंध, शब्द  स्पर्श की अनुभूति से अभिप्रेरित विचारों का मैल है। धार्मिक अथवा तांत्रिक साधना काल में अक्सर ऐसे सपने प्राय: दिखाई देते हैं जो इस बात का द्योतक है की हमारे मन की गंदगी बाहर उत्सर्जित हो रही है। 

कभी कभी ऐसी अवस्था भी होती है जब व्यक्ति पूरी तरह सोया नहीं होता है। उसे अपनाने आसपास की आवाज़े भी सुनाई देती रहती है परंतु वह लगातार सपना देखता रहता है। ऐसी स्थिति को अर्धस्वप्न अवस्था या सरसाम की स्थिति कहते हैं।

किस ऋतु में अधिक सपने दिखाई देते हैं ?

ऋतुओं की बात करे तो बसंत ऋतु में बहुत सपने दिखाई देते हैं। बसंत ऋतु में जैसे पेड़ पौधे पुष्पितपल्लवित होते हैं, उसी प्रकार अन्य जीवों में भी नए रक्त और होर्मोंस का अधिक स्राव होता है। जिस कारण हिप्पोकैंपस अधिक सक्रिय हो जाता है। बसंत ऋतु मेँ ही अधिकतर पेड-पौधे पुष्पित-पल्लवित होते हैं

नेत्रहीन, मूक बधिर कैसे स्वप्न देखते हैं ?

यह भी  एक कौतूहल का विषय है की जो लोग बचपन से अंधे होते हैं  वे किस प्रकार के सपने देखते हैं? उन्होने तो कभी कोई वस्तु आँखों से देखी नहीं होती है। तब सपनों में नेत्र्हीन लोग क्या देखते हैं? जब कुछ नेत्रहीन व्यक्तियों से इस बारे में पूछा गया तो दो तरह के उत्तर मिले। जो बिलकुल ही नेत्रहीन थे उन्होने बताया की वे किसी प्रकार का रंग सपनों में नही देख पाते। स्पर्श के अनुभव से जो छवियाँ उन्होने अपने मन में बनाई होती है, उनसे मिलती जुलती अथवा विकृत रूप में उन छवियों से मिलती-जुलती छविया, वे सपनोँ मेँ देखते हैं। दूसरी ओर जो लोग हल्का सा प्रकाश देख सकते हैं परन्तु चीजों को पूरी तरह से नही पहचान पाते वे उसी रूप रंग की फीकी छवियाँ सपनों में देखते हैं। 

जो लोग बहरे होते हैं उन्हे सपनों में किसी प्रकार की आवाज नहीं सुनाई देती। उनके सपनों में चीजें व छवियाँ केवल हिलती डुलती दिखाई देती है।

इस का तात्पर्य यह हुआ की सपने मस्तिष्क की उन यादों और अनुभवों की उपज है जो व्यक्ति होश संभालने के बाद  एकत्र  करता है। ऐसे अनुभब शब्द, स्पर्श, रूप, रस गंध से संबन्धित इंद्रियातीत अनुभवोँ से निर्मित होते हैं। 

बच्चों के स्वप्न
आपने देखा होगा की छोटे बच्चे सोते सोते डर जाते है। कभी-कभी वे सोते हुये अचानक उछल पड़ते हैं या सोते-सोते हंसने लगते हैं । उनकी बंद आंखे लगातार तेजी से घूमती रहती है। इसका अर्थ है की वे भी सपने देखते हैं। यद्यपि यह अनुमान लगाना कठिन है की सपनों मे बच्चे  क्या देखते हैं। बच्चे उनके द्वारा  देखे गए सपनों को अधिक देर तक याद नहीं रख पाते। उनकी यदाश्त घुलनशील होती है। बच्चों के मामले में यह बात देखी गई है की वे सपने में उठ कर बैठ जाते हैं और अपने हाथ के इशारे से एक ओर इशारा कर रहे होते हैं, जैसे की वे किसी चीज को देख रहे हों और उससे डर रहे हों।

अल्ट्रा साउंड जांच से यह पता चलता है की जब बच्चा माँ के गर्भ में होता है तो अकेला खेलता रहता है। कभी कभी उस की दिल की धड़कन बढ़ जाती है। कभी वह सिकुड़ कर कोख में सिमट जाता है। कभी तेजी से इधर-उधर अठखेलियाँ करता रहता है। उस समय वह न तो फेफड़ों से सांस ले रहा होता है और न ही उसे रूप, रस, गंध का अनुभव होता है। केवल मात्र शब्द का ही अनुभव एक बच्चे को अपनी माँ की कोख में होता है, वह प्राथमिक रूप से वह अपनी माँ की आवाज को अच्छी प्रकार सुन और समझ सकता है। साथ ही वह उन सभी लोगों की आवाजों को भी पहचानता है जो लगातार उसकी माँ के लगातार संपर्क में रहते हैं। गर्भ में बच्चे सोते भी है। सोते समय कभी-कभी वे डर कर उछलते हैं। ऐसा अनुमान है की ऐसा वे किसी बिशेष प्रकार के सपने देख प्रतिक्रिया करते हैं। संभव हैं कि गर्भ में बच्चों के सपने उनके द्वारा सुनी गई आवाजों से संबंधित होते होंगे।

यहाँ एक बात उल्लेखनीय है की जब माँ कोई डरावना सपना देखती है तो अचानक बच्चे की क्रियाशीलता  कोख में बढ़ जाती है। बच्चे  व माँ का संपर्क आपस मेँ स्नायु तंत्र के जरिये नहीं होता है। मात्र गर्भ-नाल ही माँ और बच्चे के बीच संपर्क का एकमात्र  साधन है। गर्भ-नाल में स्नायु तंत्र नहीँ होते हैं।

स्वप्न में मन का वर्चस्व

किसी भी जानदार प्राणी का शरीर एक छोटी सी कोशिका से बनना शुरू होता है, उस कोशिका से जो अपने आप  भी माँ और पिता की दो आधी-आधी कोशिकाओं से निर्मित होती है। जो ऐसे जटिल शरीर और मस्तिष्क का निर्माण करती हैं जिस की कार्य प्रणाली को समझने में हमें न जाने और कितना समय लगेगा।

विज्ञान ने भले ही बहुत तरक्की कर ली है पर कुछ चीजों के आगे  वह अभी भी एक बच्चे की तरह है। जिस प्रकार आत्मा का अस्तित्व युगों-युगों से एक रहस्य है, उसी प्रकार सपनों का भी एक अलग संसार है जो रोचक, रोमंचक और रहस्यमय है।      
                                                         .. प्रकाश गौतम

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