मैं डाक विभाग मेँ नया–नया इंस्पेक्टर लगा था. उस
समय मेरी उम्र लगभग अठाईस साल की रही
होगी. हिमाचल प्रदेश के एक अंदरूनी विकट पहाडी इलाके मेँ मेरी पहली नियुक्ति हुई
थी. मेरा मुख्यालय एक बहुत ही रमणीक टूरिस्ट कस्बे मेँ था जो पहाड की ऊंची चोटी के
पास था. यहाँ से दूर-दूर तक फैली ऊंचे ऊंचे पहाडोँ की श्रृँखलाएँ दिखाई देती थी
जिन की चोटियाँ साल भर सफेद बर्फ से ढकी रहती थी. नीचे दूर-दूर तक फैली घाटियाँ दिखाई
देती थी. यहाँ पहाडोँ की ढलाने देवदार, रई, फर, तोष, बान और बुराँस के घने
जंगलोँ से ढकी हुई थी थे.
गर्मियोँ मेँ अप्रैल से ले कर जून महीने तक यहाँ का
मौसम इतना मनोरम, इतना सुहावना होता था कि शब्दोँ
मेँ वर्णन नहीँ किया जा सकता. ऐसा लगता था कि प्रकृति ने एअर कंडिशनर लगा रखा हो. ऐसी
ठंडी और सुगंधित हवा चलती थी कि मन खुशी से झूम उठता था.
परंतु जुलाई से ले कर सितम्बर तक यहाँ इतनी बारिश
होती थी कि तीन महीने तक आसमान बदलोँ से ढका रहता था और झम-झमा-झम बारिश होती थी.
इससे कई स्थानोँ पर पत्थर और मलबा गिरने से यातायात अवरुद्ध हो जाता था जिस कारण
मैँ बरसात के दिनोँ मेँ अपने मुख्यालय से बाहर इंस्पेक्शन करने नहीँ जा पाता था.
मेरे अधीन लगभग अस्सी डाकघर आते थे जिनकी प्रशासनिक
गतिविधियाँ मुझे ही देखनी होती थी. इन मेँ से अधिकतर डाकघर नीचे मैदानी गरम इलाके
मेँ थे. डाकघर दो तरह के थे. एक तो सब पोस्ट औफिस जो सारे दिन खुले रह्ते थे. दूसरे
छोटे पोस्ट औफिस जिन्हेँ शाखा डाकघर या ब्रांच पोस्ट औफिस के नाम से पुकारा जाता
था,
जो तीन से लेकर पांच घंटे तक ही खुले रहते थे. शाखा डाक घरोँ का
सँचालन अतिरिक्त डाक विभागीय डाक कर्मचारी करते थे. शाखा डाक घर अधिकतर ब्राँच
पोस्टमास्टर के घर के एक कमरे मेँ होते थे.
सब पोस्ट औफिस तो आम तौर पर बडे गाँव मेँ होते थे
जहाँ राज्य सरकार के लोक निर्माण विभाग के रैस्ट हाऊस होते थे. सब पोस्ट औफिस की
इंश्पेक्शन करते समय मैँ रैस्ट हाऊस मैँ ही ठहरता था. पर छोटे ब्रांच पोस्ट औफिसोँ
के गाँव मेँ रैस्ट हाऊस की सुविधा नहीँ होती थी. ब्रांच पोस्ट औफिसोँ की इंसपैक्शन
करते समय रात को ब्रांच पोस्टमास्टर के घर पर ही रुकना पड्ता था.
उन दिनोँ बसोँ व अन्य आवागमन के साधन सीमित थे. हम
लोग दूर स्थित ब्रांच पोस्ट औफिसोँ मेँ सुबह या दोपहर तक नहीँ पहुंच सकते थे.
कभी-कभी तो हम लोग शाम को सात बजे तक ही पंद्रह-बीस किलोमीट् क पैदल रास्ता तय
करके गंतव्य डाकघर तक पहुंचते थे.
इन सब डाकघरोँ की इंस्पेक्शन एक साल मेँ एक बार
अवश्य ही करनी पड्ती थी. इंस्पेक्शन का कार्य इस प्रकार निर्धारित होता था कि हर
महीने आनुपातिक रूप से लगभग बराबर इंस्पेक्शनेँ हो जाएँ. परंतु यह क्रम अधिकतर
खराब मौसम के चलते गडबडा जाता था.
साल 1995 के जून महीने की बात है. मेरे मुख्यालय से
लगभग सत्तर किलोमीटर दूर सोनपुरी नाम का एक छोटा सा कस्बा था. यह कस्बा बिल्कुल
नदी के किनारे बसा था. यहाँ भारत सरकार का बिजली का एक प्रोजैक्ट लगा था. यहाँ
स्थानीय लोगोँ के घर तो इक्का-दुक्का ही थे पर प्रोजेक्ट कर्म्चारियोँ की दूर दूर
तक फैली कलोनियाँ थी. कुछ रोजमर्रा के सामान और चाय की दुकाने थी. प्रोजेकट का एक
बहुत ही सुंदर रैस्ट हाऊस था.
प्रोजेकट के कार्यालयोँ के अलावा सरकारी कार्यालयोँ
के नाम पर यहाँ एक केंद्रिय विद्यालय और एक सब-पोस्ट औफिस था जिसमेँ छोटे-बडे
कुल मिला कर चार कर्मचारी तैनात थे. इस
स्थान को जाने के लिये एक मात्र सरकारी बस थी जो मेरे मुख्यालय से सुबह दस बजे
चलती थी और एक बजे सोनपुरी पहुंचती थी और तुरंत ही वापिस आ जाती थी.
मैंने सोचा यह जून का महीना है, मैं इस दूरस्थ उपडाकघर की इंस्पेक्शन कर लूँ. बरसात मेँ परेशानी
होगी. वैसे
तो दूर के डाकघरोँ मैं अकेला नहीँ जाता था. अपने साथ अपने अधिनस्थ एक फील्ड कर्मचारी
को साथ ले कर जाता था. परंतु इस बार मैंने सोचा कि सब पोस्ट औफिस की ही इंस्पेक्शन
तो है, अकेला जाता हूँ.
मैँ बस मेँ बैठा और एक बजे सोनपुरी पहुंच गया. सब
पोस्ट औफिस के सब पोस्टमास्टर ने प्रोजेक्ट अधिकारियोँ को एक पत्र लिख कर मेरे
लिये प्रोजैक्ट रैस्ट हाऊस मेँ एक सेट दो दिन के लिये बुक करवा लिया. उन दिनो प्रोजेक्ट
के अधिकारी और कर्मचारी डाकघर के कर्मचारियोँ और अधिकारियोँ की बहुत ही इज्जत करते
थे. क्योँकि डाकघर आम जनता और सरकारी कार्यालयोँ के लिये संचार का सुगमता से
उपलब्ध एक्मात्र साधन था.
मै रात को आठ बजे तक इंस्पेक्शन करता रहा. सब
पोस्टमास्टर के अनुरोध पर प्रोजेक्ट के एक बडे अधिकारी ने मुझे डाकघर से रैस्ट
हाऊस तक ले जाने के लिये एक जीप भेज दी क्योँकि डाकघर से रैस्ट हाऊस नदी के उस पार
लगभग चार किलोमीटर दूर एक उजाड स्थान पर था. रैस्ट हाऊस मेँ रहने व खाने का बहुत
ही बढिया इंतजाम था.
सब पोस्ट औफिस के सभी कर्मचारी भी मेरे ही साथ आ गए
थे. हम सब लोगोँ ने खूब बाते की और मिल कर
रैस्ट हाऊस मेँ ही खाना खाया. रात को लगभग साढे ग्यारह बजे वे लोग मुझे गुड-नाईट
बोल कर चले गए.
गर्मी बहुत अधिक थी. पंखा चालू था. पर फिर भी गर्मी
से राहत नहीँ मिल रही थी. मैंने अपनी कमीज उतार दी और बनियान पहन कर ही बिस्तर पर
लेट गया. मुझे नीँद आने ही लगी थी कि मेरे कमरे के दरवाजे की काल बेल बज उठी.
मैँ उठा. मैंने बत्ती जलाई और दरवाजा खोला. सामने बरामदे मेँ एक सख्श खडा था जिसे मैँ पहली बार देख रहा था. जिन लोगोँ ने हमेँ खाना
खिलाया था, उन मेँ से वह नहीँ था. उसने विनम्रता पूर्वक
हाथ जोडे और पूछा -' साहब क्या आप सो गए थे?' मैंने उसके अभिवादन का उत्तर दिया. मुझे उस के ऊपर थोडी खीझ भी आ रही
थी रात को बारह बजे डिस्टर्ब करने के लिये.
उसने मुझसे कहा -'साहब रात को बाहर मत निकलना. कुंडी
अच्छी तरह लगा लेना. रैस्ट हाऊस बस्ती से दूर नदी किनारे है. यहाँ रात को जानवर भी
घूमते रहते हैँ.'
मैंने उसका धन्यावाद किया और कहा - 'ठीक है.' फिर
मैंने दरवाजा बंद कर दिया. थोडी देर मैंने लाईट चालू रखी. फिर लगभग एक बजे मुझे
जोर की नीँद आने लगी. बीच-बीच मेँ नदी के उस पार लोमडियोँ के सामूहिक रूप से
चिल्लाने की आवाज आ रही थी. मुझे थोडा डर भी लग रहा था.
मैंने मेंन लाईट औफ करके नाईट लाईट चालू कर दी जो
नीले रंग की थी. गर्मी बहुत थी. मैंने
अपने कमरे की एक खिड्की के बाहर वाले शीशे वाले फलक खोल दिये और अंदर की ओर लगे जाली
वाले फलक चिटखनी लगा कर बंद कर दिये. इससे कमरे मेँ ठंडी-ठंडी हवा के हल्के-हल्के
झोंके आने लगे. फिर मैं गहरी नीँद सो गया.
रात को कोई तीन बजे जब मैं गहरी नीँद मेँ सोया था अचानक टक-टक की आवज से मेरी नीँद टूट गई. मेरे कमरे के दरवाजे पर
हल्की हल्की थपथपाने की आवाजेँ आ रही थी. मैँ चौकन्ना हो गया. मेरे दिल की धड्कन बढ गई और मेरी सांसे
तेज हो गई. मैँ आंखे बंद करके चुपचाप बिस्तर पर पडा रहा. थोडी रुकवट के साथ
दरवाजे पर थप-थप की अवाज होती जा रही थी. उसके बाद दरवाजा थपथपाने की आवाज बंद
हो गई. मैंने रहत की साँस ली. सोचा कोई कुत्ता वगैरह होगा.
अभी दस मिनट ही बीते होंगे कि कमरे के बाहर पायल की
छन-छ्न.... छम-छम की अवाज आने लगी. ऐसा लग रहा
था कोई पायल पहन कर मेरे कमरे के बाहर इधर से ले कर उधर चक्कर लगा रहा है. पायल की झंकार भरी आवाज मधुर थी पर रात के सन्नाटे मेँ यह आवाज भयानक लग रही थी. पायल की एक झनकार होते
ही कलेजा मुँह को आ जाता था.
फिर लगा कि यह छन-छन..छम-छम की आवाज उस खिडकी के
पास आ कर रुक गई जो मैंने ठंडी हवा आने के लिये खोली थी. मेरी सांसे एक बार फिर से
फूल गई. मैँ सोच रहा था कि मेरी साँस लेने की आवाज बाहर ना चली जाए.
मुझे लगा कि खिड्की के बाहर कोई औरत खडी है जो
खिड्की की जाली पर हाथ रख कर कह रही थी- ‘बाबू जी.. दरवाजा
खोलो....साब...दरवाजा खोलो...डरो मत..’ खिडकी की जाली पर हाथ
फेरने की आवाज मैँ साफ-साफ सुन पा रहा था. मेरी साँसोँ के उपर मेरा काबू नही रह
गया था.
मैं चुप चाप अपनी साँसे रोके अपने उपर काबू कर के
लेटा रहा. मेरे दिल की धडकनेँ इतनी तेज हो गई थी कि लग रहा था कहीँ हार्ट फेल न हो
जाए. मैने गायत्री मंत्र जपना शुरु कर दिया. मुझे लग रहा था जैसे गायत्री मंत्र
पढने से मुझे कुछ हौसला मिल रहा है. मेरे गले मेँ रुद्राक्ष की एक माला थी जो मुझे
एक बाबा ने दी थी जब वह अचानक मेरे दफ्तर मेँ आया था. माला देते समय बाबा ने
हिदायत दी थी कि इसे मैं कभी गले से न उतारूँ. सोते समय भी पहन कर ही रखूँ. मैंने
माला को अपने हाथ मेँ थाम लिया. मुझे लगा रुद्राक्ष की यह माला मुझे कुछ नहीँ होने
देगी.
कुछ देर बाद लगा कि छ्न-छ्न की आवाज धीरे-धीरे दूर
होती जा रही है. थोडी ही देर मेँ पूरी तरह सन्नाटा छा गया. वातावरण मेँ ठँडक हो गई
थी. मुझे गहरी नीँद आ गई.
सुबह दरवाजे पर काल बेल के बजने पर मेरी नीद टूटी.
मैँ अलसाया हुआ उठा. लग रहा था पूरा बदन टूट गया है. मैंने दरवाजे की चिट्खनी खोली.
बाहर रैस्ट हाऊस का चौकीदार ट्रे पर चाय का कप लिये खडा था. वह अंदर आया. उसने गुड
मौर्निंग बोल कर चाय का कप टेबल पर रख दिया. उस समय सात बज चुके थे.
चाय पीते पीते मुझे रात की घटना याद आ गई. मैँ सोचने
लगा यह मेरे मन का वहम होगा या मैंने कोई सपना देखा होगा.
नौ बजे तैयार हो कर मैँ सब पोस्ट औफिस मेँ पहुंच
गया और बाकि बची हुई इंस्पेक्शन निपटाने मेँ जुट गया. पर मेरे मन मेँ लगातार रात
की ही घटना घूम रही थी. मैंने इस बारे मेँ किसी को कुछ नहीँ बताया. अब मेरा मन
नहीँ हो रहा था कि मैं दुबारा उस रैस्ट हाउस मेँ जाऊँ.
दोपहर बाद लगभग चार बजे मैंने सब पोस्ट की
इंस्पेक्शन समाप्त की. उस समय तक मेरे मुख्यालय को जाने वाली बस वापिस चली गई थी.
मैंने मन मेँ ठान लिया कि अब मैं आज उस रैस्ट हाऊस मेँ किसी सूरत मेँ नहीँ जाऊँगा.
मैंने सब पोस्ट्मास्टर से कहा कि मैं दस किलोमीटर दूर स्थित बागडी शाखा डाकघर की
इंस्पेक्शन करूंगा. मेरे साथ एक डाक रनर को भेज दो.
सब पोस्टमास्टर ने मेरे साथ एक डाक रनर को भेज दिया
जो बागडी गाँव का ही रहने वाला था. बागडी गाँव के ब्रांच पोस्ट्मास्टर को भी
टेलीफोन द्वारा सूचना दे दी गई कि इंस्पेक्शन करने के लिये इंस्पेकटर साहब आ रहे
हैँ.
डाक रनर ने मेरा सूट्केस उठाया और हम पैदल ही चढाई चढते
हुए उपर बागडी गाँव की ओर चल दिये. दोनो पसीने से तर-बतर हो रहे थे. चढाई इतनी थी
कि हर सौ मीटर चलने के बाद सुस्ताना पड रहा था. फिर भी हम दोनोँ हंसी मजाक करते
हुए चढाई चढ रहे थे.
बागडी गाँव पहुंचने पर ब्रांच पोस्टमास्टर ने मेरी
आव-भगत की. वह मेरा ही हम उम्र कोई तीस साल का स्मार्ट युवक था. उसकी शादी हुए
पांच साल बीत चुके थे पर अभी तक उनके कोई बच्चा नहीँ था. वह गाँव में रोजमर्रा की
वस्तुओँ की परम्परागत दुकान चलाता था. उसके माता-पिता गुजर चुके थे.
उस समय तक शाम के आठ बज चुके थे. मैंने ब्रांच
पोस्टमास्टर को कहा कि अभी ही इंस्पेक्शन स्टार्ट कर देते हैँ. कुछ अभी कर लूंगा,
कुछ सुबह निबटा दूंगा. ब्रांच पोस्टमास्टर ने खिसियाते हुये क्षमा याचना के लहजे
मेँ कहा कि बागडी गाँव से लगभग दो किलोमीटर दूर एक अन्य गाँव मेँ उसके एक
रिश्तेदार के घर पर शादी है. उसे और उसकी धर्मपत्नी को वहाँ जाना पडेगा. परंतु
शादी मेँ भाग ले कर वे लोग रात बारह बजे तक लौट आएँगे. उस समय तक आपको घर मेँ
अकेले ही रहना पदेगा.
मैंने कहा- ‘कोई बात नहीँ. यहाँ आस-पडोस के घरोँ मेँ भी तो कोई रहेगा ही’. उसने कहा- ‘आस-पडोस के सभी
लोग इकट्ठा हो कर शादी मेँ जा रहे हैँ. आपको यहाँ तब तक अकेले ही रहना पडेगा’.
उसने मुझसे आग्रह किया कि मैं भी उनके साथ शादी मेँ
चलूँ. परंतु मैंने विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया. मैँ थका हुआ भी था और बिना बुलाए
शादी के समारोह मेँ जाना मुझे अच्छा नहीँ लग रहा था.
इतने मेँ उसकी धरमपत्नी भी आ गई. उसने मुझसे पूछ -'आप खाने मेँ क्या लेंगे.... वेज या नोन वेज.' मैंने कहा – ‘ नोन वेज तो मैँ नहीँ खाता...अब आप लोग जाते-जाते कहाँ खाना बनाने मेँ उलझोगे... आप लोग शादी मेँ जाओ. देर हो जाएगी. मैंने वैसे भी देरी से खाना खाया है. अभी मुझे
भूख नही है’.
ब्रांच पोस्टमास्टर की धर्मपत्नि ने कहा – ‘भैया, आप यहाँ भूखे थोडे ही रहोगे. मैँ आप को जल्दी से पुलाव बना ही बना देती
हूँ... बस, बीस मिनट मेँ बन जाएगा.'
ब्रांच पोस्टमास्टर मुझे अपने घर की उपरी मंजिल पर
ले गया. यहाँ जाने के लिये लकडी की सीढीयाँ थी. उपर की मंजिल मेँ बाहर पहाडी शैली
मेँ बरामदा था जो सामने से खुला था. अंदर एक खुला हाल था जिसमेँ दोनो ओर दो डबल
बैड लगे थे. एक दीवार पर 12 बोर की एक बंदूक लटकी थी. दूसरी दीवार पर जंगली हिरण
के सिर सजा कर रखे थे तो काफी पुराने लग रहे थे. शायद ब्रांच पोस्टमास्टर के
बाप-दादा के जमाने के रहे होंगे. बीच मेँ एक सैंटर टेबल लगा था. कमरा बहुत अच्छा
सजा था. मैंने इस सजावट की तारीफ की.
ब्रांच पोस्टमास्टर ने ध्न्यावाद की मुद्रा मेँ मुस्कुराते
हुए मुझसे कहा –‘आप कपडे बदल कर आराम से बिस्तर पर
लेट जाईए. बहुत थक गए होंगे’.
लगभग पच्चीस मिनट बाद ब्रांच पोस्टमास्टर की पत्नी ने
एक डोंगे मेँ पुलाव और एक डोँगे मैँ दही ला कर टेबल पर रख दिया और कहा –‘भैया आप को जब भी उचित लगे, खा लेना और खाना खा कर आराम से सो जाना.’
ब्रांच पोस्टमास्टर की पत्नी के इतनी तेजी से खाना
बनाने के अंदाज़ की मैंने मन ही मन बहुत तारीफ की.
ब्रांच पोस्टमास्टर ने कहा – ‘ सर, दरवाजे की चिट्खनी अंदर से बंद मत करना, वैसे ही दरवाजा बंद कर लेना. हम लोग जब आएँगे तो अपने आप दरवाजा धकेल कर खोल लेंगे.’
फिर वे लोग गाँव वालोँ के साथ शादी मेँ भाग लेने के
लिए चले गए. मैंने खाना खाया और दरवाजा उड्का कर डबल बैड पर लेट गया. मैंने कमीज उतार कर सिरहाने रख दी. वातावरण मेँ
पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ था. मैँ पिछली रात को घटी घटना के बारे मेँ सोचने लगा. मुझे
ऐसा आभास हो रहा था जैसे बाहर बरामदे मेँ कोई है. मैं यह सोच कर आश्वस्त हो गया कि शायद कोई कुत्ता या बिल्ली होगी.
कोई भी
लकडी के जीने से आराम से पहली मंजिल के बरामदे मेँ आ सकता था. कमरे की लाईट
जली हुई थी. मैँ थोडा डरा हुआ था. मैंने अपने सूटकेस से टॉर्च निकाल कर अपने
सिरहाने के नीचे रख ली और चुप-चाप लेट गया. बीच-बीच मेँ कुत्तोँ के भौँकने और
जंगली जानवरोँ की आवाजेँ आ रही थी. मैँ थोडा निश्चिंत इस कारण से भी हो रहा था कि
गाँव मेँ कई कुत्ते होने के कारण कम से कम कोई जंगली जानवर तो शायद गाँव मेँ नहीँ
आ सकता था.
इसी उहा-पोह मेँ कई घंटे बीत गए. मैँ ब्रांच
पोस्टमास्टर का इंतजार करते-करते थक गया पर वे लोग नहीँ आए. मुझे थोडी चिड्चिडाहट भी होने लगी थी.
करीब एक बजे मुझे बाहर लकडी के जीने पर किसी के
चलने की आवाज आई. फिर बरामदे मेँ कदमोँ की आहट और पायल की झंकार की आवाज आई. मुझे
कुछ तसल्ली हुई कि चलो वे लोग अब आ गए.
मैँ चुप-चाप सोने का नाटक कर के बिस्तर पर पडा रहा
और हल्के से आंखे खोल कर देखता रहा. धीरे से दरवाजा खुला. एक सजी-धजी जवान लडकी कमरे के अंदर आई. कुछ पल वह दरवाजे से कुछ अंदर आ कर खडी हो गई और कमरे का अवलोकन करती
रही. फिर वह दबे पाँव मेरे बैड के पास रखे टेबल तक आ गई और थोडा हल्के से झुक कर मुझे देखने लगी.
मैँ सोने का नाटक करता रहा. फ़िर वह दूसरी ओर के डबल
बैड पर जा कर बैठ गई जैसे किसी का इंतजार कर रही हो. ब्रांच पोस्टमास्टर की पत्नि को तो
मैँ पहचान गया था. यह लड्की वह नहीँ थी. अगर यह लड्की ब्रांच पोस्ट्मास्टर की धर्म्पत्नि नहीँ थी तो फिर यह लड्की कौन थी? मैंने सोचा कि
शायद ब्रांच पोस्टमास्टर की ही कोई रिशतेदार होगी और उन लोगोँ से पहले शादी समारोह से आ
कर उनका इंतजार कर रही होगी.
फिर वह लड्की उठी और दरवाजा बंद करके वापिस बिस्तर
पर आ कर लेट गई. बीच बीच मेँ जब वह पल्टियाँ खाती थी तो उसकी पायलोँ की झंकार हो
उठती थी.
मुझे उस लडकी के कमरे मेँ आने से कोई फर्क नही पडा
था पर जब उसने दरवाजा बंद किया तो मेरी तो जान ही निकल गई. मैँ दूसरे के घर मेँ
सोया था और एक लडकी दरवाजा बंद करके मेरे कमरे मेँ थी. घर मे हम दोनो के सिवा कोई
नहीँ था.
मैँ सोचने लगा अभी अगर ब्रांच पोस्टमास्टर और उसकी
पत्नि आ गए तो क्या सोचेँगे. गर्मी के कारण मैँ बनियान मैँ ही सोया था. मुझे बडा
ही अजीब लग रहा था. मैँ उठ कर कमीज तक नहीँ पहन सकता था. मैँ पल्टी तक नहीँ खा पा रहा था जिस करण मेरा बदन सुन्न सा होने
लगा था. उधर दूसरे पलंग पर लेटी वह लडकी बीच-बीच मेँ मुझे देख कर पायल की झंकार करती
जा रही थी. मेरे मन मेँ विचार आया कि मैँ बिस्तर से उठ कर यहँ से भाग जाऊँ. पर फिर
ठिठक गया कि बाहर गाँव के कुत्ते मुझे काटने को दौडेगे. उपर से यह लडकी मुझ पर
हंसेगी.
अभी मैँ यह सोच ही रहा था कि वह लडकी झटके से उठी और
मेरे सिरहाने के पास आ कर बड्बडाने लगी – ‘यह माला क्योँ
पहनी है...उतारो इसे’. उसने मेरे गले मेँ पडी रुद्राक्ष की
माला को छूने के लिये हाथ बढाया पर न जाने
ऐसा क्या हुआ कि वह एक झटके से नीचे गिर पडी. वह उठी और थोडे कडक लहजे मेँ कहने
लगी -‘इस माला को उतार कर फेँक दो’.
मुझे थोडा गुस्सा और थोडी चिढ भी हो रही थी कि इस लड्की को मेरी माला से क्या दुश्मनी है.
मुझे थोडा गुस्सा और थोडी चिढ भी हो रही थी कि इस लड्की को मेरी माला से क्या दुश्मनी है.
मैँ सुन्न हो कर उसकी हरकतेँ देखता रहा और मन मेँ
सोचता रहा कि यह बेहया लड्की मुझे आज मरवा कर ही छोडेगी. मुझे ऐसा कुछ नहीँ लग रहा
था कि कुछ डरावना घटित हो रहा है. मैंने सोचा कि यह लड्की कुछ सिरफिरी किस्म की
है.
इस सारे घतनाक्रम को होते होते रात के अढाई बज गए
होँगे. इतने मेँ बाहर फिर से कदमोँ की आहट सुनाई देने लगी. काफी सारे कदमोँ की आहट
और आवाजेँ आ रही थी. थोडी देर मेँ दरवाजे पर ठक-ठक करने की आवाज हुई. मेरा ध्यान
उस लड्की से हट कर दरवाजे पर चला गया.
दरवाजा खुला. ब्रांच पोस्टमास्टर और उसकी पत्नि चहकते
हुए अंदर आए. उन्होने मुझे देखा और आश्चर्य से पूछा- 'अरे..साहब आप अभी तक सोए नही?... हम तो शादी मेँ काफी लेट हो गए. सारे गाँव वाले अभी ही पहुंचे हैँ'.
मैँ अवाक हो कर उन्हे देखता रहा. मैंने अपनी नजरेँ घुमा
कर उस स्थान को देखा जहाँ थोडी देर पहले वह लड्की खडी थी. वहाँ अब कोई नहीँ था.
इससे पहले कि मैँ कुछ सोच पाता अचानक कमरे मेँ जला बिजली का बल्ब बुझ गया.
ब्रांच पोस्टमास्टर ने अपनी जेब से माचिस निकाल कर जलाई.
मैंने भी उठ कर अपनी टॉर्च जला दी. कमरे मेँ हल्का उजाला हो गया. इतने मेँ मेरे
बैड के नीचे से लोमडी जैसा एक जानवर निकला और तेजी से दौडते हुए ब्रांच
पोस्टमास्टर से टकराता हुआ बरामदे से बाहर कूद गया.
ब्रांच पोस्टमास्टर हड्बडाया. उसकी धर्मपत्नी की चीख निकल गई. मेरे तो रोएँ खडे हो गए.
ब्रांच पोस्टमास्टर हड्बडाया. उसकी धर्मपत्नी की चीख निकल गई. मेरे तो रोएँ खडे हो गए.
इतने मेँ लाईट फिर से आ गई. ब्रांच पोस्टमास्टर ने मुझ
से पूछा- 'आपने शायद दरवाजा खुला रख दिया था... कोई जानवर अंदर घुस गया था... शुक्र है
आपको काटा नहीँ. यहाँ आजकल जंगली जानवर बहुत हो गए हैँ.' यह कह कर उन्होने दरवाजा
बंद कर दिया.
'रात बहुत हो गई है. हम दोनोँ भी अब यहीँ सो जाते
हैँ. कहीँ आप को डर न लगे.' यह कह कर ब्रांच पोस्टमास्टर अपनी पत्नी के साथ दूसरे डबल बैड पर सो गया जहाँ दस
मिनट पहले वह लड्की पायल की झनकार कर रही थी.
पांच मिनट बाद कमरे मे उन दोनोँ पति-पत्नि के खर्राटोँ की आवाज आने लगी. मैँ भी गहरी नीँद मेँ सो गया.
अगले दिन मैँ वहाँ से इंस्पेक्शन कर के चला आया. पर
आज बाईस साल बीतने के बाद भी मैंने रुद्राक्ष की वह माला अपने गले से नहीँ उतारी
है जो उस रात पहनी थी. पिछले बाईस सालोँ मेँ फिर कुछ ऐसा नही हुआ जो उन दो रातोँ
मेँ हुआ था. मैँ अपने आप से पूछ्ता हूँ –‘क्या वो सब सच मेँ
हुआ था? या सिर्फ मेरे मन का कोई वहम था.
WRITTEN BY: प्रकाश गौतम
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