मनुष्य अपने आप को सर्वोत्तम प्राणी सोचता है। दुनिया के विकसित और विकासशील देशोँ मेँ चांद से ले कर शनि ग्रह और उससे भी
आगे आकश गंगाओँ तक जाने की होड़ मची हुई है। पर प्रकृति एक ही झटके से उसे यह बता देती
है कि वह कितने पानी मेँ है। बैक्टिरीया से भी सैंकडोँ गुणा छोटे एक कोरोना कोविड-19
वायरस ने मानव जाति को को यह बता दिया कि उसकी क्षमताएँ वायरसोँ के आगे कितनी गौण है।
एक सूक्ष्म कोरोना वायरस ने इतनी अधिक तबाही पूरी दुनिया मेँ मचा दी जिसकी कभी
कल्पना नहीँ की गई थी। चीन, जापान, कोरिया, इंगलैंड, ईटली, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस, अमेरिका आदि देशोँ
मेँ दसियोँ हजारोँ जानेँ इस सूक्षम वायरस ने अभी तक लील ली है और लीलता जा रहा है।
अकेले अमेरिका मेँ ही इस वायरस से मृत्यु का आंकड़ा प्रतिदिन 1400 से भी उपर पहुंच
गया है।
कितने ही परिवार पूरी तरह से समाप्त हो गए। कितने बच्चे अनाथ हो गए। लाखोँ लोग
जीवन और मृत्यु के झूलेँ मेँ झूल रहेँ हैँ। जो देश कल तक विकसित और सम्पन्न माने
जाते थे, जहाँ की मेडिकल सुविधाओँ का लोहा पूरी दुनियाँ मानती थी, वहाँ त्राही-माम का आर्तनाद
सुनाई दे रहा है। ऐसे विकसित देशोँ की अर्थव्यवस्थाएँ पूरी तरह चरमरा चुकी है। अन्य
सभी देशोँ की अर्थव्यवस्थाएँ भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। यह तो अभी तीन महिने
का ही दृष्य है। इसका और आगे कितना दूरवर्ती प्रतिकूल प्रभाव पूरे विश्व पर पडेगा, इसकी कल्पना करते हुए ही सिहरन
उत्पन्न हो जाती है।
कोरोना वायरस से बचाव की कोई दवा अभी तक नही बन पाई है। विभिन्न देशोँ मेँ इस
बारे मेँ परीक्षण चल रहे हैं। इस वायरस के जेनेटिक व्यव्हार को समझने के लिये
वैज्ञानिकोँ को अभी एक वर्ष से अठारह महीने का समय लगने की सम्भावना जताई जा रही
है।
परंतु जब तक इस वायरस की दवाई बन पाएगी तब तक इससे भी भयंकर कोई अन्य वायरस
प्रकट नहीँ हो जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीँ है। पिछले बीस वर्षोँ मेँ ही कोरोना SARS श्रेणी के छ: वाईरसोँ का
अटैक दुनिया के विभिन्न देशोँ मेँ हो चुका है। यह कोरोना कोविड-19 इस श्रेणी का
सातवाँ वायरस है।
अगर हम पिछले कई सौ वषोँ का इतिहास खंगालेँ तो पता चलता है कि जितनी शीघ्रता
से वायरसोँ का प्रकोप हो रहा है वह असामन्य है। यह प्राकृतिक नहीँ लगता। कोरोना
श्रेणी के लगभग सभी वायरस चीन से ही प्रसारित हुए हैँ। कारण चीनी मिडिया द्वारा यह
बताया जा रहा है कि चीनी लोग हर प्रकार के जीव-जंतुओँ को खा जाते हैँ। चमगादडोँ और
पैंगोलिनोँ पर दोष मढ़ दिया गया कि वायरस फैलाने के लिए ये जानवर उत्तरदायी है। पर
यह बात पचाने योग्य नहीँ है। चीनी लोग प्राचीनकाल से ही चमगादडोँ और पैंगोलिनोँ को
खाते आ रहे हैँ। तब इससे पहले क्योँ कोरोना कोविड के तरह भयानक वायरस का संक्रमण
नहीँ फैला ?
दाल मेँ कुछ काला दिखाई देता है। चीन
का केवल वूहान शहर ही कोरोना कोविड 19 से ग्रसित हुआ । वूहान मेँ 3200 से कुछ उपर
लोग इस वायरस के संक्रमण से मर गए। फिर स्थिति काबू मेँ बताई गयी। वूहान को छोड कर
चीन मेँ अन्यत्र कहीँ भी इस वायरस ने तबाही नहीँ मचाई। शंघाई जैसे शहरोँ मेँ इस वायरस का कोई प्रभाव नहीँ पडा। वूहान से यह
वायरस ईरान मेँ और फिर इटली मेँ फैल गया।
इटली के बाद योरोप के यन्य देशोँ मेँ और उसके बाद अमेरिका और भारत सहित कई अन्य
देशोँ मेँ।
बेरोक-टोक हवाई यातायात इस वायरस के प्रसार का प्रमुख माध्यम रहा।
विचार करने योग्य बात यह है कि चीन का नेशनल वायरस रिसर्च सैंटर वूहान शहर मेँ
ही स्थित है। तो क्या चीन किसी खतरनाक वायरस के उपर रिसर्च कर रहा था ? और क्या किसी गफलत के कारण कोरोना वायरस चीन के नेशनल
रिसर्च सैंटर से वूहान शहर मेँ फैल गया ? या यह चीन ने एक प्रयोग के रूप मेँ वूहान
शहर मेँ एक साजिश के तहत फैला दिया ? क्या चीन ने इस वायरस
की कोई दवाई या एंटी-बोडीज विकसित कर ली है ? क्या यह वायरस
चीन की सामरिक नीति का अह्म हिस्सा है ? ये प्रश्न हर किसी
के मन मेँ उभर रहे हैँ।
चीन अब चैन की सांस ले
कर चुपचाप बैठा है। बल्कि चीन के मिडिया की ओर से तो यह बयान भी आया कि यह वायरस
अमेरिका और योरोपिए देशोँ की देन है और चीन की अर्थ व्यवस्था को बरबाद करने के
लिये इन देशोँ के द्वारा इस वायरस की कृत्रिम रचना लैबोरेटरी मेँ की गयी है।
पर यह बयान अत्यंत ही
बचकाना लगता है। ऐसा कौन देश होगा जो अपने ही देश मेँ ऐसा खतरनाक वायरस फैला कर
अपनी ही तबाही कर देगा।
यह तो साफ तौर पर चीन
की ही साजिश लगती है। वैसे भी प्राकृतिक रूप से किसी जानवर के मध्यम से जब किसी
वायरस मेँ जीन म्युटेशन होता है, वह इतना भयानक नहीँ होता है। सम्बंधित
जानवर के एंटि-बोडीज वायरस के जीन को नियंत्रित कर देते है। पर वर्तमान मामले मेँ
कोरोना कोविड 19 जंगल की आग की तरह पूरे संसार मेँ फैल गया । ऐसा तभी सम्भव हो
सकता है जब वायरस के जीनोम को सिंथेटिक तरिके से इतना स्ट्रोंग बना दिया जाए कि
एंटी-बोडीज ही बन न पाए।
कठिनाई यह है कि सभी
देश एकला चलो की नीति पर चल रहे हैँ। विभिन्न देशोँ के बीच तालमेल ही नहीँ है। ऐसा
इन देशोँ की स्वार्थपरता के कारण हो रहा है। सब देशोँ को अपने सामरिक और आर्थिक हित
दिखाई दे रहे हैँ, भले ही लाखो लोग मर क्योँ न जाए।
ऐसा इसलिए है कि जब
कोई देश कोरोना कोविड-19 की दवाई बना लेगा तो वह इसे अन्य देशोँ को महंगे दामोँ
मेँ बेच कर अरबोँ-खरबोँ रुपये कमा लेगा। गरीब देशोँ की न तो आर्थिक औकात और न ही
हिम्मत ही है कि ऐसी दवा बना सके।
पूरे विश्व को तो इस
वायरस ने यह समझा ही दिया है कि सभी देशोँ की अर्थ-व्यव्स्थाएँ आपस मेँ कितनी जुडी
हुई है। जिन देशोँ मेँ यह महामारी फैली है, उन देशोँ की अर्थ व्यवस्थाएँ तो तबाह हुई
ही है पर जहाँ अभी तक यह महामारी नहीँ फैली है, उनकी अर्थ-व्यव्स्थाओँ
की चूलेँ भी हिल गई।
अमेरिका सहित अन्य सभी
देश दो महिने तक सिर्फ तमाशा देखते रहे। उन्होने सपने मेँ भी नहीँ सोचा कि यह
वायरस कभी उन देश मेँ भी विकराल रूप ले सकता है।
बात यह नहीँ है कि
एक-दूसरे के सिर पर इस वायरस को पैदा करने का ठीकरा फोड़ते रहेँ या एक दूसरे को
पानी पी पी कर कोसते रहेँ। अब यहाँ आवश्यक्ता इस बात की है कि सभी देश अपने
स्वर्थोँ को दर किनार करके, एक साथ मिल कर इस वायरस या इस प्रकार के
अन्य वायरसोँ के उपर रिसर्च कर के शीघ्र इस का तोड़ निकाले। अन्यथा करोडोँ लोग अकाल
मृत्यु मारे जाएँगे। पूरा विश्व सदियोँ पीछे चला जाएगा। पिछले तीन महीने के
संक्रमण ने यह तो प्रमाणित कर ही दिया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन
को इस बारे मेँ पहल करनी चाहिये और अपने पर्यवेक्षण मेँ इस वायरस की दवा या टीके का
अनुसंधान करवाना चाहिए।
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