Thursday, 24 September 2020

बीता कल - रीती यादें : The Past Memories

 

कितने लोग बिछुड़ गए, कितने लोग मिल गए,

कितने फूल झड़ गए, कितने फूल खिल गए,

मैं बिखरे हुए सपनों के, टुकड़े समेटता रहा,

अपनी रीती हुई यादों को, यूं ही सहेजता रहा,

                  .... यूं ही सहेजता रहा

पलक झपकी भी न थी, कि जिंदगी सरक गई,

नींद खुली भी न थी, की धूप ढलक गई,

उम्र मेरी गुजर गई, चाहा जिसे न पा सका,

चाहतों के पात झड़े, मैं स्वप्न देखता रहा, 

                                 ....   मैं स्वप्न देखता रहा

शब्द आँसू बन गए, स्वर सब सहम गए,

थके-थके कदम मेरे, हर मोड़ पर ठिठक गए,

अरमान दिल में घुट गए, किसी से कह न सका,

मै बीते हुए कल का, ज्वार-भाटा ही देखता रहा,

                                  .... ज्वार-भाटा ही देखता रहा

जिसे अपना समझा, उसी ने साथ छोड दिया,

जिसे मीत समझा, उसी ने दिल तोड़ दिया,

दिल में घुमड़ रहे तूफान, पर दम घुटा-घुटा,

अकेलेपन की घाटियों में, यूं ही खड़ा लुटा-पिटा,

                                   ....  यूं ही खड़ा लुटा-पिटा

स्वर्ग धरा पर उतार दूँ, मैं ऐसा सोचता रहा,

दु:ख सबके बाँट दूँ मौके ऐसे खोजता रहा,

अपने टूटे हुए अरमानों से, सपने सजाता रहा,

कोई मुझे  समझ न सका, यूं ही कसकता रहा,

                                     .... यूं ही कसकता रहा

कितने लोग बिछुड़ गए, कितने लोग मिल गए,

कितने फूल झड़ गए, कितने फूल खिल गए,

मैं बिखरे हुए सपनों केटुकड़े समेटता रहा,

अपनी रीती हुई यादों को, यूं ही सहेजता रहा,

                 .... यूं ही सहेजता रहा

(रचनाकार : प्रकाश गौतम)

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